Friday, June 1, 2007

वंदना



राम संस्कारों के संयत-संयत सौरभ हैं।
भारतीय संस्कृति-सभ्यता के गौरव हैं।।

बिना राम के कौन विश्व की करें कल्पना।
बिना राम के पूर्ण कहां आराध्य-अर्चना।।

राम, शांति के प्रबल-प्रकट प्रथम नायक हैं।
इति-श्री समृद्धि-सिद्धि के वर दायक हैं।।

वंदन है अभिराम, तुम्हारा शत्-शत् वंदन।
रधुबंश की लाज, कौशल्या देवी नंदन।।

राम महासागर से उपजी ‘समर्थ राम’ मम हृदय।
‘कमलाकर’ गा रहे कृपा से माँ सरस्वती सदय।।

No comments: