Friday, June 1, 2007

समर्थ राम


(1)
एक शिला पर राम बैठे चिंतन में
एक पर लक्ष्मण विराजे
और वानर सैन्य दल
चहुँ ओर तत्पर है सुराजे

(2)
क्या भविष्य के गर्त में है
राम सब कुछ जानते हैं
किन्तु फिर भी मौन बैठे
लेख विधि का मानते हैं

(3)
अन्यथा क्या एक दृष्टि
प्रलय का कारण न बनती
सहज ही सागर लहर पथ
छोड़ देतीं, न उफनती ?

(4)
कुछ न बोली वायु स्वयं
हाथ मलती रह गई
एक मानव के ऊधम को
शांत होकर सह गई

(5)
रह गए थे देखते सब
नभ-रवि-चन्द-उड्गन
क्रूर कर में तीतरी सी

(6)
खग-विहंग सब शांत थे
कुछ कह न पाते
शीश नत कर, धरा को
देखते, आँसू बहाते

(7)
चर – अचर अंजान से
देखते मुख किन्तु मौन थे
एक कारज हेतु सब के
ह्रदय – सम दोन थे

(8)
कौन प्रभू, राम जो कि
जल रहे हैं वियोग में
सत्य या कि मृषा है यह
योग या संयोग में

(9)
इस समय तो आस्था से
राम, राजा, हो रहे हैं
बीज, जड़-चेतन भविष्य में
आस्था के बो रहे हैं

(10)
आस्था हाँ, बस यही तो है
मनुष्य पाषाण में सपने संजोता
देखता, निज कर्म क्रीड़ा
पुण्य होता, पाप धोता

(11)
राम हो या अन्य कोई
चाहिए आदर्श-पथ
अन्यथा, फिर क्या धरा है
जीव औ जीवन वितथ

(12)
प्राप्त है देवत्व मुझको
राम को यह ज्ञान है
शेष सहजन को कहाँ इस
दिव्यता का भान है

(13)
घट रहा है या घटित होगा
नियति सब जानती हैं
मृत्यु की अवधारणा को
पूर्णतः पहचानतीं है

(14)
अनमना सा राम का मन
सोचता था बार-बार
किंतु सीता के लिए हो युद्ध
मेरा स्वार्थ यह संहार

(15)
‘मैं कि मुझको प्राप्त है देवत्व’
तो फिर निन्ध कारज क्यूं करूं
‘पुरुषोत्तम’ को कर कलंकित
शील को अपशील करके क्यूं मरुं

(16)
देखता हूँ युद्ध की विभीषिका में
कौन जीता कौन मरता
दृश्य नयनों से न ओझल हो रहा
मृत्यु का साम्राज्य धरती पर उतरता

(17)
युद्ध के पश्चात् बचता शेष क्या
अस्थियां चबाते श्वान रक्त पीते हैं
उनको भी तो मरा हुआ जानो
जो निर्बल निस्सहाय पड़े जीते हैं

(18)
युद्ध, वास्तव में सत्ता के
शीर्ष व्यक्ति की उन्मत्तता है
अन्यथा शांति के अभिधान से
क्या कुछ नहीं बना है

(19)
जाओ लक्ष्मन जाओ, मेरे साथ
पीड़ा भोगते हो व्यर्थ क्यों
एक झेले दुःख बहुत है
दूसरे के साथ यह अनर्थ क्यों

(20)
मैं, स्यवं के भाग्य का प्रारब्ध
लिखा, भोगता हूँ जानकर
एक साधारण मनुष्य के रूप हूँ
अतः कष्ट होता मुझे भी बंधुवर

(21)
सच कहूं, तुमने अभी देखा
नहीं कुछ,जन्म-मृत्यु मध्य क्या है
अनुराग में ही भूलकर समझा
नहीं तुमने, कि यह आराध्य क्या है

(22)
एक ही हों कोख से जन्में तो क्या
भाग्य सबका एक सा होता कहाँ
एक भूमि-एक कृषक-एक ही श्रम
किन्तु क्या फल एक सा होता यहाँ

(23)
मार्ग, जिस पर चल मरे कितने पथिक
किन्तु क्या सब एक ही जैसे चले
दीप, सहसो एक जैसे झिलमिलाते
किन्तु क्या सब एक ही जैसे जले

(24)
यह धरा कहती नहीं तो क्या हुआ
भार तो पावन-पतित का सह रहीं
और यह अपराजयी भागीरथी
जय किसी भूपेश की क्यों कह रही

(25)
समगति से चन्द्र-सूरज चल रहे हैं
कौन है आदेश देता नभ चढ़ा है
गल रहा प्रतिपल कोई अभिशाप पाकर
शीश ताने क्यों हिमालय फिर खड़ा है

(26)
मृत्यु क्या है मात्र शिशु कर में खिलौना
निश्चित नहीं कुछ भी, कभी भी टूट जाये
यह शरीर, सद्दश माटी का कलश
क्षणिक से आघात से ही फूट जाये

(27)
जानता था मैं कि मुझको
एक दिन, बन गमन करना पड़ेगा
पूर्व जनम का दोष जो मुझ पर
लगा था, एक दिन भरना पडे़गा

(28)
दोष इसमें था विमाता का कहाँ पर
‘ईश’ के आदेश का पालन किया
कौन माता है, जो अपने पुत्र को
सुख न दे, दोष क्या था, सुख दिया

(29)
राज मोह में पितृ के आदेश का यदि
बन गमन से मोड़ मुख पालन न करता
पितृ का सम्मान ही बचता कहाँ फिर
सम्मान में, यदि पुत्र मर्यादा न धरता

(30)
चाहता तो प्रश्न करता पितृ से मैं
बहु विवाह, क्या न मेरे भाग्य का कारण बने
छोड़कर तुमको न होता अन्य कोई
कौन शक्ति थीं जो मेरे किरीट का वारण बन

(31)
किन्तु यह भी सोचता हूँ, भ्रम है मेरा
क्या तुमको मोह सत्ता का सताता
अनुराग जैसा आज तुम दिखला रहे हो
उस समय भी क्या यही अनुराग पाता

(32)
देख लो इतिहास के पन्ने पलट कर
सत्ता नहीं संबंध रखती है किसी से
या तो यह दासी है चाटू कारिता की
या तो फिर चलती है कंचन-कामिनी से

(33)
पुत्र होकर मैं पिता से प्रश्न करता
फिर कहां यह पुत्र-धर्म आदर्श होता
फिर कहां यह राम, यह आलोक होता
राम क्या इतिहास में उत्कर्ष होता

(34)
क्यों न फिर धिक्कारती जननी मुझे
कोसती निज कोख को संताप करती
नाथ, नारी के लिए सम ईश्वर हैं
पुत्र हेतु जाप कर क्यों पाप करती (35)

(35)
न लगाता चरण रज माथे यदि
तो दशरथ सुत राम मुझको कौन कहता
जन्म पाता कुछ दिवस पश्चात् मृत्यु वरण करता
राम केवल राम रहता विश्व सारा मौन रहता

(36)
ईश्वर ही मनुष्य का सर्जक हुआ है
और मनुष्य के रूप में आकार होकर
मनुष्यों में ही मनुष्य का चयन करता
स्वयं न आता है भी अवतार होकर

(37)
भूपति दशरथ ने क्या सोचा कभी था
पुत्र उनका ‘ईश का’ अवतार होगा
यद्यपि वह मनुष्य जैसा ही दिखेगा
कर्म किन्तु धर्म का आधार होगा

(38)
देखता हूँ मैं भविष्य को साश्रात्
धरा की गंध नभ छू रही है
यद्यपि वेदों में है प्रमाण किन्तु
वह कथा जो अनछुई है, अनकही है

(39)
आज तक सम्बंन्ध जो निस्वार्थ थे
भविष्य में सब स्वार्थ से प्रेरित रहेंगे
धर्म केवल दर्शनीय रह जायेगा
धर्म ग्रंथ अपनी कथायें स्वयं कहेंगे

(40)
कितना भयावह दृश्य मेरे सामने हैं
शास्त्र जलते हैं चिता पर, शस्त्र कर में
ओहः क्या यह आर्यवृत्त संतान है
खेलते हैं रक्त की होली नगर में

(41)
आहः मनुज होकर, पशु तुल्य लड़ रहे हैं
और, दिखावा कर रहे हैं प्रगति का
बात करते शीश उठाकर व्योम से
ग्रास स्वयं ही बन रहे-निज दुर्गति का

(42)
क्षीण भुजबल-ज्ञानबल का दर्प करके
व्यर्थ ही में खो रहे अपना परिचय
ज्ञान का क्या अर्थ है यह जानकर
मूढ़ जय-ज कर रहे किसकी विजय

(43)
ज्ञान का है अर्थ समझे वेदना को
छिद्र करता शूल किसके पाँव में
तृप्ति हृदय को न मिल पाई यदि
वह तरुवर क्या कि जिसकी छाँव में

(44)
कपि कहाँ, वे दिव्य पुरुष है पूँछ वाले
जिनके शरीरों में असीमित बल भरा है
क्यों न उनको हम कहें संतान आदि
साक्षी स्वयं यह नियति पसुंधरा है

(45)
किस शती में, कब उन्होंने, योग साधा
अब मिला जाकर उन्हें उस योग का फल
राम को देवत्व धारण जब हुआ
देव सेवा में हुए निस्वार्थ यह योगी सबलरर

(46)
योग है प्रभू मिलन का अटल साधन
हम यदि नित योग के साधक बन
फिर कहाँ शक्ति किसी में कोई आकर
योगियों के कर्म में वाधक बने

(47)
योग शक्ति उस अनल का नाम है
जो उमड़ती वासना को शांत करती
योग ही कारण बना नश्वर जगत् का
योग पर ही अड़िग है आकाश-धरती

(48)
राम की तन्द्रा अचानक टूटती है
टूटता है ज्यो कोई नभ का सितारा
अरे, यह तो कर्मभूमि है यहाँ पर
कर्म ही सर्वश्रेष्ठ जीवन का सहारा

(49)
देवत्व का यह अर्थ नहीं कि में किसी के
भाग्य का अंतिम बनूँ प्रांरभ रोकूँ
और क्या अधिकार मुझको मैं किसी
विषपाई के विष दंत तोडूं-दम्भ रोकूँ

(50)
घट रहा है जो, उसे भोगना है
मनुष्य ही क्या देवगण कब रोक पाये
देव हो या कोई साधारण मनुष्य हो
सब खड़े हैं शीष को अपने नवाये

(51)
कर्मभूमि पर मनुष्य का कर्म निश्चित
क्या उचित है मनुष्य का यह विचार
कदाचित यह मनुष्य का भ्रम ही है
अन्यथा तो स्वयं मनुष्य है कर्मकार

(52)
आर्यावर्त की पावन धरा पर जन्म लेना
देव होने से तनिक भी कम नहीं है
चहूं ओर बिखरा ज्ञान का वैदिक उजाला
दंभ भरते हम धरा पर तम नहीं है

(53)
भोर होते ही चहकता पक्षियों का
रूप यह परमेश्वर की वंदना का
यद्यपि तरु, जड़ होकर हैं खड़े
शीतल पवन संदेश है अराधरा का

(54)
और भी है जीव-जंतु-जड़ अनेक
अनगिनत, किन्तु है सब अराधनारत
नर, नयन से देखता ही दूर कितना
कौन किस-किस रूप में है साधनारत

(55)
ओह, यह अथाह महासागर अमर
कौन जाने, बाट किसकी जोहता है
जानते है सब कि सब नश्वर यहाँ पर
प्रेम में आकंठ डूबे मूढ़ मन की मोहता है

(56)
प्रेम तो अनिवार्य है, अनवरत है
चेतना से या कि जड़ से शाश्वत हो
स्मरण ही न रहे आगत-विगत
चिर-मिलन हो स्वांस संगम प्राणरत हो

(57)
प्रेम ही तो आत्मा है विश्व जन की
आकृतियों से, रंग से अन्तर न पड़ता
वेशभूषा और भाषा भी पृथक हो
स्वप्न चक्षु भाव मन का कब बदलता

(58)
प्रेम ही जब श्रेष्ठ है संसार में
रक्त पायी पाप क्यों कर हम करें
शांति का पाठ देकर विश्व जन को
मार्ग देकर, मार्ग में कंटक धरें

(60)
हों अगर संभावनायें युद्ध की
वार्ता की शांति का हल निकाले
स्वार्थ नीति-मोह-मद को त्यागकर
कल्पना का स्वर्ग धरती पर बसा ले

(61)
प्राण घट में आए जब से खोजते हैं
धन-बल से शांति आए, असंभव
मात्र पथ है एक, हो सम्मान सबका
दीन जन को दे यदि सम्मान वैभव

(62)
चाहते हैं सब सखी होना यहाँ पर
वस्त्र-अन्न- आवास पाकर मुस्कुराना
आओं प्रथम कर्म हेतु श्रम करें हम
क्या कठिनहै फिर, धरा पर स्वर्ग लाना

(63)
सूर्यास्त होते ही उठ गए लखन
बोले भईया उठो सांझ का दीपक ऊजारे
सकल देव कल्याण करें शुभ हो
मंगलमय हो, आरती उतारे

(64)
नीरज सा खिल उठा श्रीमुख उठे राम
मनो मलि की नहीं तनिक भी मुख पर छाया
मग-पग पर जय- विजय चली, अहो राम चले
ज्योतिर्मय हो उठा ब्रह्म, नव दीप दीप जलाया

(65)
सौभाग्य शाली हम कि हो यदि राम जैसे
सद-आचरण-सद् भावना-सद् संस्कार
सत्य निष्ठा-सत्य भक्ति-सत्य कर्म
स्वाभिमानी-सत्य दानी-स्तय विचार

(66)
सर्वप्रथम विश्व में किसने कहा
हमने कहा, ‘यद धरा है माँ हमारी’
ज्ञान की प्रथम किरण फूटी यहीं से
सर्वप्रथम थे यहीं पर देहधारी

(67)
तम के तन से फूट कर विखरा उजाला
दीप की बाती प्रथम हमने जलाई
यह जो आलौकिक छटा है प्रकृति में
स्वर अनादि नाद में पड़तदा सुनाई

(68)
जीव का संपूर्ण जीवन राम मय हो
हों यदि हम राम के आदर्श वाहक
गर्व से तब हम कहें ‘यह माँ हमारी’
पूज्य हों इस धाम के उत्कर्ष वाहक

(69)
भारतीय संस्कृति का कौन रक्षक
अस्तित्व देवी-देवताओं को न माने
गूँजती नित वेदवाणी भोर की गंधित
पवन में, शंख नादित धरा का गौरव बढ़ाने

(70)
यद्यपि, आराध्य स्वयं ही राम है
दृश्य अद्भूत आरती स्वयं की उतारे
अन्य करते कामना निज धाम की
राम करते याचना स्वदेश की बाँहे पसारे

(71)
आर्यवृत के है यहीं तो सु- संस्कार
सत्य-निष्ठा पूर्वक घटते मतत्
यद्यपि बाधा निरंतर झेलते
फिर भी चलते आ रहे हैं अनवरत

(72)
कर्म पावन हो यही तो धर्म है
भावना विस्तार की मन में न हो
कल्याणकारी श्रेष्ठ-शुभ हो वर्तमान
भविष्य की चिंता किसी जन में न हो

(73)
राम शैया पर यही तो सोचते हैं
अब न हो धरती पे कोई भी समर
निर्भर गगन-वन-भूमि-वीथी विपत
आभार माने हम सभी मानव अक्षर

(74)
नींद नयनों में कहाँ है राम के
राम डूबे हैं जगत कल्याण में
आए हैं वनवास में अपने लिए क्या
नहीं-नहीं वे है किसी अभियान में

(75)
‘ईश’ स्वयं आते मनुष्य के रूप में
फैलता है पाप जब-जब भी धरा पर
होते मुनिवर जब तपस्यारत वनों में
विघ्न बनते राक्षस तप-साधना पर

(76)
अन्य जन के कष्ट में हो न द्रावित
वह मनुष्य, पावन धरा पर भार भर है
देखकर दुख जीव का जिस आँख में
अश्रू न आये, मात्र वह आकार भर है

(77)
जो न रक्षक बन सके वह वीर कैसा
व्यर्थ ही होता है उसका बाहू बल
जो बटोही को न छाया दे सके, वह विटप क्या है
अधर को तृप्त कर पाये न वह किस अर्थ का जल

(78)
वह दृष्टि क्या कि जिसमें खोट हो अखोट हो
और जिव्हा क्या कि तो बोले न भाषा प्यार की
सद्भावना जिसमें न हो वह आचरण क्या
वह बड़प्पन क्या कि जो बातें करें अधिकार की

(79)
राम तो सर्वगुण से सम्पन्न है, अभिराम है
तर्जनी उन पर उठा सकता है कौन
राम कुछ क्षण इक दिशा को देखते हैं
एकटक, सोचते हैं और हो जाते हैं मौन

(80)
योगी जन अपना भविष्य स्वयं देखते हैं
अनवरत सदियों से चलता आ रहा है यह क्रम
राम कितने योग ले, प्रकट हुए हैं इस धरा पर
जिनके चरणों में हो त्रिकाल उनमें क्या भ्रम

(81)
कर चुके हैं दानवों का अनट मद दमन
हो चुका बनवास का एक काज पूरा
राम कितने योग ले, प्रकट हुए हैं इस धरा पर
जिनके चरणों में हो त्रिकाल बरस का राज पूरा

(82)
दानवों का दमन कर राम क्या प्रसन्न थे
विवशता थीं, अन्यथा मनुष्यता मर न जाती
शिष्ट जीवन हेतु स्थापित हुई जो
आर्यवृत्त की संस्कृति क्या सर उठातीं

(83)
राम मेरे अनंत-अनादि-अपरिमेय हैं
विश्वास है अभिराम मन का आस्था के
आर्यवृत्त की शांति के ध्वज वाहक राम है
राम है सर्वत्र-सर्वस्व मनुष्यता की कथा के

(84)
आओ, हृदय पर पड़े दूषित पटल को
खोल कर देखे, वास्तव में राम क्या हैं
धर्म-भाषा-द्वेष को हम भूल कर, जय
बोल कर देखें, वास्तव में राम क्या है ?

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