लिखना मेरी नियति है, कर्म है। कभी भी रहूं, कैसे भी आनन्द के या कठिनतम क्षण हों, लेखन सहज रूप ले लेता है। ऐसा क्यों होता में नहीं जान सका हूं। ‘वीणा’ आकार लेती रही। अनियमित जीवन जीने के कारण ‘वीणा’ का प्रत्येक छंद अनियमित ही आकार लेता रहा । इस स्वरूप को ज्यों का त्यों आपके समक्ष रखने में महानंद का बोध शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। ‘वीणा’ में छंद बहुआयामी भावों में यथा स्थान है तथा ‘क्रीड़ा’ ‘पीड़ा’ और ‘वीणा’ के माध्यम से लगातार व्यक्त होते जाते हैं। इन छंदों को एक सूत्र में बांधने का साहस मैं न कर सका, इसीलिए प्रत्येक छंद जन्मनुसार अपने स्थान पर है।
क्रीड़ा-पीड़ा-वीणा ठीक उसी तरह हैं, जैसे शैशव-जवानी-बुढ़ापा। ‘वीणा’ कभी सुख, कभी दुख में समाप्त हो जाती है, पर इस पीड़ा के समाप्त होने तक अनन्त सुख-दुख के दुर्गम मार्गों से जीव यात्रा का क्रम निरंतर चलता रहता है। कैसी-कैसी अनुभूतियों ने इस जीवन को समाप्त होने तक अपने मकड़जाल में फँसा-फँसा के रुलाया-हँसाया है। मनुष्य के आनंद प्राप्ति के साधन विचित्र हुआ करते हैं। कुछ इतिहास बनते हैं, तो कुछ परिहास बनते हैं और कुछ बिना कुछ बने ही काल के गाल में समा जाते हैं। जिन्हें हम युगों तक स्मरण करते हैं वे कैसा जीवन जी गये ? क्या ले गये अपने साथ ? कुछ नहीं। यह देश क्या है और उसकी संस्कृति क्या है, जिसके लिए भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, अशफाक हंसते हुए मृत्यु का वरम कर गये। इस बात से हम भली-भांति परिचित हैं कि नश्वर जगत का त्याग निश्चित है। फिर यह नफरत, स्वार्थ, छल-कपट कैसा ? क्या एक रोटी आपस में मिल बांट कर नहीं खाई जा सकती ?क्या एक छत के नीचे पृथक धर्म में बंटे समाज के प्राणी धूप-वर्षा से बचाव में अपना गुजारा नहीं कर सकते, अपने आनंद का जरा-सा त्याग नहीं कर सकते ? त्याग हो सकता है ! ईश्वर की दी हुई सम्पूर्ण विचार शक्ति के मालिक हैं हम ! किन्तु ऐसा नहीं हो रहा है और यह नहीं हो पाना ही मेरी ‘पीड़ा’ है। ‘वीणा’ के पृष्ठों पर यही भावना बिखरी है।
विधिवत् मेरे जीवन में कुछ भी नहीं हुआ, शिक्षा भी नहीं । जो कुछ पाया, घर में रखी उन पुस्तकों से, जिनमें चरित्र निर्माण, आदर, गुरुजनों का सम्मान, वतन परस्ती, विश्वास, दया, प्रेम, अहिंसा, संवेदना तथा जीवन-यापन की कुंजी मिला करती थी। यह किसी स्कूल की कक्षा पास करने वाले ज्ञान से अधिक थी। कहां गये वे श्रवण कुमार, चार दरवेश, हातिमताई, लव-कुश, खुदा दोस्त वाले नाटक और उनके जीवन पात्र ?सभी कुछ समय की बर्बरता ने हमसे छीन लीया । ‘वीणा’ में कहीं-कहीं उन्हें खोजने का प्रयत्न किया गया है। ‘वीणा’ के पूर्व मेरे बाल साहित्य के अन्तर्गत लिखी गई ‘काठ का घोड़ा’ को बाल पाठकों ने पसन्द किया। ‘काठ का घोडा़’ बाल साहित्य में कहां स्थान पायेगी इसे भविष्य ही बतायेगी।
मेरे लेखन पर बड़े भाई इनायत अली साहेब का प्रभाव रहा है। बाद में द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’ जी का । आज दोनों ही इस नश्वर जगत से विदा ले चुके हैं, पर मेरी स्मृतियों में सदा बने हैं शिवपुरी, ग्वालियर के बाद आधे से अधिक जीवन बिलासपुर में बीत रहा है, इस नगर का मैं कर्जदार हूं। अरपा के मनोहरी तटों पर बिलासाका दर्शन शायद हीकिसी को नसीब हुआ है ! मुझे गर्व है-‘वीणा’ लिखकर बिलासा का थोड़ा सा कर्ज उतारा है पर अभी उसके आंगन की पावन रज का कर्ज शेष है, जो भविष्य में उसी आशीर्वाद से उतरेगा-
“जीवन ऐसा जिया, तेरा तुझको दिया है।
दुनिया तेरे खजाने से एक कफन भर लिया है।”
और,
“करके सबको दुआ-सलाम, राम-राम जै सियाराम।
चले सफर को ‘कमलाकर’, डेरा-डंगर अपना थाम।”
यहां से मेरा रचना संसार आकार पाता है। इस यात्रा में जो मेरे साथ रहा है वह है मेरा आत्म-सम्मान, जिसे जीवित रखने के लिए महारचनाकार से भी दो-दो हाथ करने में नहीं चूका-
“क्या दोष धरा पर फेंका, अब नहीं धरा से जाते ।
स्वच्छंद घूमते तब तक, जब तक तुम नहीं बुलाते।”
(प्रकाशनाधीन “कालजयी” से)
इस महारचनाकार से कहीं निवेदन भी है-
“बिन तारे सब तर गयै, तरू-तरणी-तमचार।
मेरो तारक कौन है, मौ मंग तारन हार।”
(प्रकाशनाधीन “कमलाकर दोहा शतक”‘ से )
इन दोनों स्थितियों के मध्य आपका निर्णय और प्रेम मेरा संबल है। निष्पक्ष भाव से सुदामा बन भी जी चुका। सुदामा को महलों की लालसा न रही है, न रहेगी। स्थानीय घोंघा बाबा मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण मेरी जीवन-क्रीड़ा का साक्षी है। यहीं कभी प्रातः स्मरणीय स्वामी आत्मानंद जी के आशीर्वाद से मैंने कहा था-
“गीता मेरी नस-नस में, मन में बसा कुरान है।
सत्य, अहिंसा परमोधर्मा, यही मेरा ईमान है।
किस मंदिर में गजर बजाऊं,किस मस्जिद में शीश झुके,
जाति से मैं मानव हूं, कर्म मेरा भगवान है।”
आज वे नहीं है। भाई हृदय सिंह चौहान, लक्ष्मी नारायण मिश्र भी नहीं हैं, और न घोंघा बाबा मंदिर का काव्यमय वातावरण । श्री बाबूलाल सीरिया, श्री मैथ्यू जहानी ‘जर्जर’ और जनाब राज मल्कापुरी जिनके साथ आज भी अपनी खुशियां बांट रहा हूं।
इन नगर के आवारा मसीहा के रूप में अपनी बेबाकी से मेरा मन जीतने वाले श्री श्याम लाल चतुर्वेदी जी का प्यार जाने-अनजाने, जब भी मिला, मेरा उत्साह दुगना हुआ। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासुपर (म.प्र.) के कुलपति प्रो. रामकृपाल सिंह एवं उनकी सहधर्मिणी, समाजसेविका, चिकित्सक डॉ. (श्रीमती) विमला सिंह के प्रेरणादायी व्यक्तित्व एवं स्नेह ने मुझ जैसे रचनाकर को ऊर्जा व साहस प्रदान किया है। शिक्षा को समर्पित व अन्तरर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक प्रो. रामकृपाल सिंह जी (म.प्र. के सर्वोच्च सम्मान डॉ. कैलाशनाथ काटजू से पुरस्कृत) ने अपने गुरुतर दायित्व के साथ इस पुस्तक पर अभिमत व्यक्त किया, उसके लिए हार्दिक आभार। श्री नंद किशोर तिवारी, (कुलसचिव ,गुरु धासीदास विश्वविद्यालय), साहित्य मर्मज्ञ व समालोचक श्री मंहावीर समंह बघेल (उप कुलसचिव, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय), डॉ. दशरथ अग्रवाल, डॉ. आर.एस. चौहान, कविवर हरिशंकर पाण्डेय “हरिहर” (ग्वालियर), श्री एस.पी.माथुर. श्री मसूद अख्तर (प्रशासनिक अधिकारी एवं साहित्यकार), डॉ. ए.एम. अग्रवाल, का भी विशेष आभारी हूं जिनके सहयोग व मार्गदर्शन से यह कृति अपनी सार्थकता की ओर बढ़ रही है।
पत्नी नाजमा अली व पुत्रों का भी सहयोग प्रशंसनीय है जिन्होंने अपनी पारिवारिक व्यस्तताओं का भार वहन करते हुए मुझे लेखन में सहयोग दिया । तीन वर्षीय पोते शानू (शाश्वत आजाद) ने अपनी बाल सुलभ चेष्टाओं एवं चंचलता के भाव ‘वीणा’ के पन्नों में छोड़े हैं।
पुस्तक के प्रकाशक भी धन्यवाद के पात्र हैं जिनकी रुचि ने इसके शीघ्र प्रकाशन को गति प्रदान की और कार्य को सम्पन्न किया। शेष कुछ भी नहीं है। ‘वीणा’ आपके हाथों में है, मूल्यांकन आपको करना है, मैं तो ‘वीणा’ को आकार देकर बरी हो गया।
0 हिदायत अली ‘कमलाकर’
24 मार्च 96, रामनवमी
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