1
मैंने विरासत में पायी है
प्रकृति के संग करना क्रीड़ा।
जान सको तो अपनी जानो
मेरी क्या जानोगे पीड़ा।
हर जीने वाले का पथ है
अपना-अपना अलग-अलग ही
मैं भी अपने पथ पर चलता
साथ लिये श्वासों की वीणा।
2
तनिक तुम्हारा साथ हुआ क्या
प्राण कर उठ नूतन क्रीड़ा।
यदि छोड़ तिम गये कभी तो
सह न सकूंगा दारुण पीड़ा।
किन्तु सत्य है ययही किसी दिन
छोड़ सभी को जाना होगा,
किसी दिवस स्वयं टूट जायेगी,
श्वासों में यह झंकृत वीणा।
3
नश्वर जग में मतवाला ही
कर सकता है अनुपम क्रीड़ा।
सत्य भुला कर जो जीता है
वह पाता है पल-पल पीड़ा।
कर्म क्षेत्र में आने पर ही
थक जाने पर सुख होता है,
तारों पर उंगलियां निरंतर
चले तभी बजती है वीणा
4
जो जीवन को नहीं समजता
उसको दिवास्वर है क्रिड़ा ।
जो शूलों पर नहीं चला हो
वह क्या जाने पग की पीड़ा।
केवल स्वयं के हित में जीना
ही, जीवन का अर्थ न होगा,
करे दूसरों का प्रसन्न मन,
उसकी सदा सुहागन वीणा।
5
मेरे निकट वहीं जन आते ट
जिनके जीवन में है क्रीड़ा।
उससे क्या सम्बंन्ध बने जो
भोग रहा निश-वासर पीड़ा।क
उदित सूर्य के स्वागत हेतु.
सुख-शैया जो छोड़ खड़ा हो,
अन्य समय तक स्वस्थ-सुव्यवस्थित
बजती रही उसी की वीणा।
6
माँ के हित में खेल गये वह,
शीष कटाने की जो क्रीड़ा।
काट दासंता की जंजीरे
झेल गये प्राणों की पीड़ाष।
अरे धूर्तों उन्हें आज तुम
सम्प्रदायों में बाट रहे हो,
कर्ण पटों पर सम रस घोले
भेद न करती उनकी वीणा।
7
जितने हों उपकरम और भी
जो भरते हों मन में क्रीड़ा।
जिनके निकट नहीं आई हो
कभी भूल कर भी जग पीड़ा।
यदि हो सके तो उन सबको
साथ मेरे ही दफना देना,क
छोड़ मुझे जो चले गये थे
उनके साथ बजेगी वीणा।
8
मधुशाला के स्वामी ने ही
मुझे सिखाया करना क्रीड़ा।
प्रथम बार पीकर मधुकर से
भूल गया था सारी पीड़ा।
बिना पिये अब चैन कहां है
बार-बार पीता जाता हूं,
सब कुछ भूल गया हूँ लेकिन
पीना नहीं भूलती वीणा।
9
पिता-पुत्र के आदर्शोंकी
लोप हो गई मधुरिम क्रीड़ा।
झेल रही हैं माता-बहिनें
परिवर्तित युग की यह पीड़ा।
सम्बंन्धों में पड़ी दरारें
सम्मानों की लुटिया डूबी।
तार-तार रुदन करता है,
बड़ी कठिन कलियुग की वीणा।
10
नभ में बिजली थल में केकी
जल में मीन मचाती क्रीड़ा।
देख प्रफुल्ल वन-जीव मनुष्य
की, और विकल हो जाती पीड़ा।
सदा दूसरों को आंखों में
स्वतंत्रता खलती आई है,
क्या न हृदय जलता विरही का
श्रावण की बजती जब वीणा।
11
मन की गहराई से होती
तन की नित नव-नूतन क्रीड़ा।
किन्तु हु मन यदि मलिन तो
तन की बढ़ जाती है पीड़ा।
तन का मन सेमेल बढ़ा तो
शीघ्र निकलती मन की अर्थी,
मन कातन से मिलन हुआ तो
और मधुर हो जाती वीणा।
12
मन्दिर-मस्जिद-चर्च सभीकी
अलग-अलग होती है क्रीड़ा।
किन्तु न भेद किसी सेकरती
एक बराबर सबकी पीड़ा।क
एक धरा को, एक हृदय को,
तोड़-तोड़ हमने बांटा है।
सबके मन में प्रेम भाव का
दीव जलाती केवल वीणा।
13
पावन ग्रंथों के पृष्ठों से
दीमक नित करी है क्रीड़ा।
काष्ठा घरों की शोभा बनकर
सहते हैं प्राणों की पीड़ा।
सिक्त अधर का चुम्बन लेने
कभी अनल आ जाता है, तब
पुनः संस्कृति के स्वर लेकर
झंकृत हो उठती है वीणा।
14
तब तक जाता कोई नहीं है
जब तक पूर्म न होती क्रीड़ा।
एक-एक कर जान वाला
दे जाता है कितनी पीड़ा।
बड़ी विडम्बना यही कि अब तक
साथ नहीं जा पाया कोई।
किसी की संध्या और किसी की
प्रातः सुप्त हुई है वीणा।
15
राजनीति, मंदिर-मस्जित में
खुले आम जब करती क्रीड़ा।
अरी निपूति, तू क्या जाने
भक्तों के हृदयों की पीड़ा।
तूने तो सीखा है केवल
मनुष्य मात्र का रक्त बहाना,
मृत्यु सत्य यद्यपि, समझ
तू, कभी,अर,इसमन की वीणा।
16
करो करो जितना जी चाहे
तुम प्रकृति के संग संग क्रीड़ा।
किन्तु न इतना अधिक ,कि
बढ़ती जाये प्रकृति की यह पीड़ा।
यह धन तो है समस्त धरा
का, समस्त प्राणियों के हित हेतु
कितना भी उपयोग करो तुम
पर न कभी कुछ कहते वीणा।
17
स्थापित कर गये पूर्वज
निज आदर्शों की जो क्रीड़ा।
सुरक्षित रखना वर्तमान में
विद्वजनों की है यह पीड़ा।
परिवर्तित युग की पीढ़ी से
कितना होगा भविष्य सुरक्षित,
ठहरो, अभी ज्ञात होगा सब
बजने तो दो यह नव वीणा।
18
पहली कभी न ऐसी देखी
जैसी आज दीखती क्रीड़ा।
नया नहीं कुछ भी लगता है,
पहले भी होती थी पीड़ा।
अन्तर है केवल इतना ही
डूब गये हम निज स्वार्थ में।
तार-तार टूकड़े-टूकड़े कर
बांट रहे हम मन की वीणा।
19
उत्तम नहीं हुआ करती है
छोड़ छाड़ करने की क्रीड़ा।
इससे और अधिक होती है
सामाजिक रिश्तों में पीड़ा।
नामकरण होने से केवल
नहीं बदलता रंग लहू का,
एक प्रकार ही, एक तार ही.
जग की नित्य बजाजी वीणा।
20
स्वयं ही उसे भोगना होगी
अपने कर्मों की यह क्रीड़ा।
नहीं दूसरों को होती है
कभीप्रतीत अन्यों की पीड़ा।
उच्च श्रृंग पर वह चढ़ता है
जिसका पग सम्बल पड़ता है,
जिस दिन छेड़ा तार उसी दिन
बजने लग जाती है वीणा।
21
जन्म-मरण के बीच मनुष्य की
जितनी भी होती है क्रीड़ा।
कुछ की अन्त सुखद होता है
कुछ की हृदय विदारक पीड़ा।
पर, परलोक एक है सबका
शूल-सुमन या कुटि-भवन हो
अन्तिम के आनंद की सारी
कथा सुनाया करती वीणा।
22
स्वतंत्रता के लिए अनोखी
वीर शहीदों की थी क्रीड़ा।
“भारत माता की जय” कहते
झेल गये फांसी की पीड़ा।
हाय, कि हम सब भूल गये हैं
वीरों के उन बलिदानों को,
हम भूलें, पर भुला न पाई
इन्द्र धनुषी सतरंगी वीणा।
23
दिन ढलते आरंभ हो जाती
भूत-पिशाचों की नर क्रीड़ा।
काली करतूतों से इनको
तनिक नहीं होती है पीड़ा।
सूरज इनका महाशत्रु है
अमावस्या इनकी चेरी है,
काग राग प्रिया है इनको
काली भैंस बराबर वीणा ।
24
देख सिकंदर काँप उठा था
राजा पोरस की रण- क्रीड़ा।
तत्कालिक राजाओं की थी
पर, अपनी-अपनी ही पीड़ा।
भोग-विलास वैभव व्याप्त था
भारत माता के पुत्रों में,
अलग-अलग सबकी ढपली थी
अलग-अलग सबकी थी वीणा।
25
जकड़ बंधनों में माता को
करते रहे फिरंगी क्रीड़ा।
तब न समझ पाया था कोई
अरे, दासता की यह पीड़ा।
पर, न अधिक दिन अत्याचारी
शासक का सिक्का चल पाया,
काली का तब रुप सजा कर
बजने लगी सरस्वती वीणा।
26
दानव के बल पर देवों ने
की सागर मंथन की क्रीड़ा।
शेषनाग की फुंकारों की
दानव झेल रहे थे पीड़ा।
अमृत कलश देव ले भागे
तभी, श्राप दावन से पाया,
हुए आज निस्तेज देव सब
दानव की बजती है वीणा।
27
अधिक नहीं चलती है, बंधु
छल की और कपट की क्रीड़ा,
दो दिन का सुख भोग आयु भर
पाते रहते वे जन पीड़ा।
मद की सीमा आ जाती, तब,
सारे मदन महल ढह जाते,
मंगल होवें यदि, अमंगल
शांत सुप्त हो जाती वीणा।
28
बड़ी पुरानी हुई आज तो
मन्दिर-मस्जिद की यह क्रीड़ा।
इनके चक्कर में पाई है
कितनों ने प्राणों की पीड़ी।
पाषाणों के मध्य घेर कर
अरे, ईश को रखने वालों
कोई न हाथ बंटाता आकर
बजे काल की जिस क्षण वीणा।
29
व्यर्थ शोर करते रहने से
कान्ति हीन हो जाती क्रीड़ा।
पराजय तो, निश्चय बढञती है
और अधइक तब, मन की पीड़ा।
कर्म करो, शांति से निरखो
श्रम का फल होता है मीठा,
‘स’से ‘सप्तक’ तक आते ही
गतिवान हो जाती वीणा।
30
कहीं अधिक, पीने वाले से
सुरबाला करती है क्रीड़ा।
किन्तु नहीं समझ पाते हैं
दोनों ही प्याले की पीड़ा ।
पीते और पिलाते जाना
अपनी-अपनी मजबूरी है,
झंकृत जब तक करे न कोई
स्वयं न कभी बजती है वीणा।
31
शांत हृदय की ज्वाला धधके
फिर देखों लपटों की क्रीड़ा
बरस बड़े जल अग्नि बन कर
फिर देखों धरती की पीड़ा।
चर्म धौंकनी की श्वासों से
लोहा भस्म हुआ करता है,
रण में बजे अगर रण भेरी
हाहाकार मचा दे वीणा।
32
करो समय की सीमाओं में
नूतन नव सपनों से क्रीड़ा।
असमय छेड़छाड़ करने से
होती है मन को अति पीड़ा।
हर एक जीव-निर्जीव, समय
के, बंधन से है बंधा हुआ,
समय बजाना चाहे जितनी
उतनी देर बजेगी वीणा।
33
शव का संस्कार करनाभी
आज रह गया करना क्रीड़ा।
तेरहवीं करना मंहगाई में,
परिवार को देती पीड़ा।क
पिन्डदान भी हो, यदि चाहे,
तब, प्रबंध स्वयं कर जाना।
अपने ही कंधों पर अपनी
चलो उठाकर अब तो वीणा।
34
यह जीना भी क्या जीना है
जिसमें कर न सकें कुछ क्रीड़ा।
जीवन से मृत्यु तक केवल
दीख रही पीड़ा ही पीड़ा।
नहीं चाहिए मुझको ऐसा,
जीवन, त्रास-दुखोंका आलय,
दे दो यदि मुझे दे पाओं,
गीत-सुमन अधरों की वीणा।
35
देने वाला देता है, पर
करवाता है कितनी क्रीड़ा।
सुख पाने के पहिले तो तुम
निश्चय ही पाओगे पीड़ा।
साहस से पग उठे तो निश्चय
लक्ष्य भेदना कठिन नहीं है,
कठिन साधना सात सुरों की
सध जाने पर बजती वीणा।
36
समय बड़ा बलवान मनुष्य से ट
करता रहता है नित क्रीड़ा।
कभी गगन भर खुशियां देता
और कभी देता है पीड़ा ।
बचो बच सको जितना भी तुम
बड़ी भयानक मार समय की,
यदि समय से बच तो सुन्दर
लगती है जीवन की वीणा।
37
मस्जिद में मुल्ला समझाता
बंदों को अल्लाह की क्रीड़ा।
जिस दिन भाग्य का फैसला होगा
गुनाहगार पायेगा पीड़ा।
नेक काम करने वालों से
खुश रहता है अल्लाताला,
बुरे काम करने वालों की
कभी न बजने देता वीणा।
38
सूरज से पहिले ही मुल्ला
मस्जिद में करता है क्रीड़ा।
जो तज देता सुमन सेज को उसके
पास न आती पीड़ा।
सुस्ती-आलस्य कुविचार ही
सबसे बड़े शत्रु मानव के
मधुमय राग सुनाने हेतु
क्या स्वयं ही आ जाती वीणा।
39
भेद करे पंडित-मुल्ला, पर,
भेद न करती जीवन क्रीड़ा
यहां एक की पीड़ा सबकी
बन जाया करती है पीड़ा।
क्रीड़ांगन पर सर्वधर्म का
नित्य हुआ करता है जमघट,
ऊँच-नीच का भाव न कोई
छोटी-बड़ी न कोई वीणा।
40
आओ देखो क्रीड़ांगन पर
कैसे प्रेम सिखाती क्रीड़ा।
एक-दूसरे की तत्क्षण ही
मिट जाया करती है पीड़ा।
मंदीर-मस्जिद गिरजाघर भी है
और यही गुरुद्वारा भी है।
यहां नहीं तो कहां बजेगी
अरे एकता की यह वीणा।
41
गीता-कुरान-बाइबिल-गुरुग्रंथ
सबका सार प्रेम की क्रीड़ा।
यदि समझ पाते हम इनको
उसी दिवस मिट जाती पीड़ा।
देर अभी कुछ नहीं हुई है
समझो, मिटने से बच जाओ,क
अन्यथा, बहुत पछताना होगा
मूक हो गई जिस दिन वीणा।
42
बन्द करो यह नफरत वाली
राजनीति की दुषित क्रीड़ा
जो जनता का सेवक बनता
वह जनता को देता पीड़ा।
उठो कि पहिले हम नफरत का
शीष फोड़ दे, दफना डाले,
और बजा दे फिर भारत में
अमन चैन सुख की नव वीणा।
43
एक प्रकार की एक ढंग की
राम-रहीम ने की थी क्रीड़ा।
मार्ग मुक्ति का जग को दिखाना
ही, केवल थी उनकी पीड़ा।
हमने बांट दिया, पर उनको
व्यर्थ, धर्म के पंडालों में,
अलग-अलग रागों में छेड़ी,
हमने राम-रहीम की वीणा।
44
रूठ गया सावन धरती से
लोप हो गई जल की क्रीड़ा।
जल विहीन, मीन सदृश है
धरती पर प्राणी का पीड़ा।
वृक्षों के कटने से संभव
मौसम की यह नाराजी है
यही गति यदि रही निरन्तर
फिर तो बजत चुकी जीवन वीणा।
45
खेल रहे हैं कमस सैकड़ों
धरती पर पालों की क्रीड़ा।
जन्में कृष्ण कहीं पर कोई
सम्बव, मिटे तबी यह पीड़ा।
अत्याचार बढ़ा है जब-जब
कहीं, कोई रोई है मीरा,
शांत भवन में रहने वाली
खड्ग रूप धर लेती वीणा।
46
जीव-अजीव के साथ नित्य ही
होती ही रहती है क्रीड़ा।
राज भवन में बसने वाला
क्या समझे कुटिया की पीड़ा।
कुआं खोद जल पीने वाला
सहस्त्रों प्यत्न किये जाने पर
बजा रहा है अपनी वीणा।
47
मंदिर में पंडित की होती
मस्जिद में मुल्ला की क्रीड़ा।
दोनों ही के वक्तव्यों से
होती है भक्तों को पीड़ा।
दोनों जन्में कुटिल कोख से,
मानवता के घोर शत्रु हैं।
पुण्य धरा पर सम्प्रदायों के
बीज रोपती इनकी वीणा।
48
क्रीड़ांगन से चिढ़ने वालों
तुमको भीकरना है क्रीड़ा।
जीना है जब तक धरती पर
रंग दिखायेगी ही पीड़ा।
खाली उदर नहीं रह सकता
श्रम का कष्ट उठाना ही है,
अलग-अलग हो कष्ट सभी के
किन्तु अलग न होगी वीणा।
49
निश्चत निर्णायक फल देकी
जितनी बीत चुकी है क्रीड़ा।
किसको कितना सुख पहंचाया
किसको दी है कितनी पीड़ा।
तुमको जो कुछ था समझाया
तुम कितना कुछ समझ सके थे
आज नहीं तो फिर कल के दिन
सब कुछ समझा देकी वीणा।
50
इस शरीर का अंग कर रहा
अपने-अपने क्रम से पीड़ा
अरे, व्यर्थ तुमने उनको दीं
बड़ी कठिन मर्मान्तक पीड़ा।
यह अधिकार तुम्हें था, केवल
संचालन की क्षण सुविधा का
किन्तु हाय, तुमने तो ऐसे
माटी मोल बिका दी वीणा।
51
तुम मधुशाला का मधु पीकर
सड़कों पर करते हो क्रीड़ा
हर आने-जाने वालों को
देते ही जाते हो पीड़ा।
इस नश्वर क्रम को तोड़ो तो
माटी से नाता जोड़ो तो,
फिर देखो कितनी मादक मय
होती है जीवन की वीणा।
52
जो करता है दूषित मन से
काम न उसके आती क्रीड़ा।
वह स्वुप्नों को क्या देखेगा
झेल नहीं पाया जो पीड़ा।
विजय श्री उसको ही वरती
जो शूलों पर चल सकता हो
जिसके हाथ सबल होते हैं
वहीं बजा सकता है वीणा।
53
क्रिड़ांगन मं आवश्यक
मिलजुलकर करना ही क्रीड़ा
यद्यपि, सभी के मन में होती
विजय प्राप्त करने की पीड़।
किन्तु पराजय भी निशअचित है
और पराजय विजय दिलाती,
उच्श्रृंग पर चढ़ बजती है
सदा अदम्य साहस की वीणा।
54
काल देवता जब करता है
जीवन में मृत्यु की क्रीड़ा।
सुख भोगी मानव को होती
अनुपम जग, तजने की पीड़ा।
छोड़ सगे-सम्बन्धी प्रियजन
श्रम-आश्रम से निर्मित वैभव।
वहां मिले ही, क्या निश्चित है
आलिंगन-अधरों की वीणा।
55
वृद्ध अवस्था में हो आती
स्मरण, शैशय की हर क्रीड़ा ।
पापों वाले दृश्य देखकर
कभी बहुत होती है पीड़ा।
उस बीते पल से अब केवल
क्षमा याचना ही बचती है,
जब-जब राग सुनाती मुझकों
वृद्ध अवस्था में यह वीणा।
56
दिखा-दिखा कर मधु प्यार को
सुरवाला करती है क्रीड़ा।
कभी पास अधरों के लाकर,
खींच अधिक पहुंचाती पीड़ा।
हर पीने वाला घिघियाता
सुरबाला के पांव पकड़कर।
कहता वर दे, आनन्दों से
भर दे जीवन की मधु वीणा।
57
भोग रहे हैं आज जिसे हम
यह है उन पुरखों की क्रीड़ा ।
जिन्हें न था आभास कि होगी
भविष्य काल को ऐसी पीड़ा।
वे जीते थे वर्तमान को
हां, कि श्रेष्ठ ही वर्तमान है।
भूतकाल के मधुर स्वरों से
यद्यपि मंडित जीवन वीणा।
58
जीवन केइस क्रीडांगन में
मात्र चार दिन होती क्रीड़ा।
अन्य दिनों में मिलती केवल
प्राणी को पीड़ा ही पीड़ा।
पर पीड़ा स्थआई न होती
क्रीड़ा स्थाई होती है,
सात सुरों को यदि हम जानें
सारा रहस्य बताती वीणा।
59
मंगल काज विवाह के हेतु
मंडप में होती है क्रीड़ा ।
कन्या को तजने की केवल
माता समझ सकी है पीड़ा।
माता ,हां माता ही केवल,
सारे कष्ट सहन कर जाती ।
और पिता, हं पिता, बैठकर
मस्त, बजाता रहता वीणा।
60
खेल रहा था साथ राम के
रावण, पांडित्यमयी क्रीड़ा ।
कुशल राम ही समझ सके थे
रावण के मन की निज पीड़ा।
था जिसमें वैराग्य हृदय का
और मरण से स्वर्ग-कल्पना,
वह ता साधक, राम साधना,
साध्य बन गई मन की वीणा।
61
कभी-कभी जब दिख जाती है
बीते जीवन की वह क्रीड़ा ।
खुशियां न्यून दिखाई पड़तीं
दिखती है पीड़ा ही पीड़ा।
पर, पीड़ाओं से जीवन का,कक
नव निर्माण हुआ करता है।
कठिन तपस्या से बज पती,
काष्ठ लौह तारों की वीणा।
62
कभी न देखी गई एक सी
जीवन की जीवन से क्रीड़ा ।
नाम यद्यपि एक हैं किन्तु
पृथक-पृथक है सबकी पीड़ा।
काम-नाम स्थान अलग हैं, पर
लक्ष्य एक सबका होता है।
कैसा भी निर्णय कर लो तुम
बनती सात सुरों से वीणा।
63
बहुत चाह थी सारे जग से
अलग रचाता अपनी क्रीड़ा ।
पर न कभी ऐसा कर पाया
देख-देख कर, नित, पर-पीड़ा।
जो पर-पीड़ा हित न जिया हो
उसका जीना भी क्या जीना,
जो न करे प्रफुल्लित मन को
अरे, तोड़ दो ऐसी वीणा।
64
समझ न पाया कोई अब तक
शिशुओं की भाषा या क्रीड़ा ।
होती होगी उनको भी, पर,
बिना कहे सह लेते पीड़ा।
ऐसी सहनशक्ति जीवन भर
काश ! कभी हमको मिल जाती।
तो न कभी दुख पाती अपने
जीवन की यह विषमय वीणा।
65
नभ में जब छाती है बदली
विद्युत कर उठती है क्रीड़ा।
बूंद-बूंद जल बरखा बनकर
हर लेता धरती की पीड़ा।
किन्तु हृदय की “पी” पीड़ा को
और बढ़ा देती है पीड़ा,
जल ही भीतर जल ही बाहर
कहां बजे यह जलमय वीणा।
66
यह उधार की श्वांस गई तो
समझो खत्म हुई सब क्रीड़ा ।
यह निश्चय जब जाना ही है
फिर क्यों झेल रहें हो पीड़ा।
साहूकार के धन घर बोलो
कितना है अधिकार तुम्हारा।
वह जब चाहे ले जायेगा
व्याज सहित वाणी और वीणा।
67
आने वाले शुभ प्रभात में
हमको करना है नव क्रीड़ा ।
शस्य-श्यामला पुण्य धरा से
मिटे क्लेश-नफरत की पीड़ा।
सतयुग सा हो समय, प्रेम
बंधुत्व-ज्ञान का हो उजियारा।
गंगा के पावन तट से फिर
गूंजे भारत वर्ष की वीणा।
68
गरज उठे नभ मंडल सारा,
फटे धरा, हो तांडव क्रीड़ा।
अर्जुन की हुंकारों सुन-सुन,
कांपे कुरुक्षेत्र की पीड़ा।
दौड़ो, वीर अभिमन्यु बनकर,
तोड़ो कुटिल चक्र व्यूह सारे।
एक हाथ में खड्ग उठा लो,
और दूसरे में लो वीणा।
69
जिसने स्वयं न कभी खेली हो,
वह क्या जाने मेरी क्रीड़ा ।
जैसे नटवर गरल पी गये
मैंने पी धरती की पीड़ा।
सारा का सारा नीलाम्बर
मेरी आभा से दमका है
प्रथम सभ्यता का उजियारा
लेकर आई मेरी वीणा।
70
अमर वही होता धरती पर
जो करता है नूतन क्रीड़ा।
जग को प्रसन्नताएं देकर
शेष, स्वयं ले लेता पीड़ा।
सूरज ऊर्जा दान कर रहा
इसीलिए पूजा जाता है,
अन्तर के तम को हर लेती
पूज्य इसी कारण है वीणा।
71
साधक करे साधना सुन्दर,
फूल लिये आती है क्रीड़ा ।
अरे, दूसरे के हित में तुम,
सहन करो थोड़ी-सी पीड़ा।
यह नित का, नियति का फेरा
क्रमवार यों ही चलता है,
सुख ही सुख पहुंचाती केवल
दुख न कभी देती है वीणा।
72
कल्पित स्वर्ग-नरक की जाने
किस प्रकार की होगी क्रीड़ा।
पर यह निश्चित है, सम्भव ही
इस जंग जैसी होगी पीड़ा।
यहां कौन किसका है केवल
करने ही भर की बातें हैं।
वहां कहीं मिल ही जाएगा
जिसने की निर्मित यह वीणा।
73
लाख पूछने पर, न कभी भी
अनपा पता बताती क्रीड़ा।
बिना किये मालूम पता, पर
दे जाती है अपनी पीड़ा।
इसका अर्थ यही है जग में
केवल पीड़ा ही पीड़ा है,
कभी-कभी रूदन के स्वर में
जैसे गा उठती है वीणा।
74
ओ धनवानों, क्यों करते हो,
दीन-दुखी जन के संग क्रीड़ा ।
जो पीड़ा लेकर जन्में हों
वे जायेंगे लेकर पीड़ा।
तुम चाहो तो इनकी पीड़ा,
अरे, प्रेम से हर सकते हो।
इनकी भी बजने दो ऐसी,
जैसे बजे तुम्हारी वीणा।
75
जो करता है दिश-धरा से
द्रोह, पुण्य माटी से क्रीड़ा।
वह है नीच-नारकी पापी
जीवन भर भोगेगा पीड़ा।
होगा स्वर्ग दूसरा कोई
मेरा स्वर्ग देश है मेरा।
मस्तक पर माटी का चंदन
कर में विजयश्री की वीणा।
76
मेरी जननी ने नस-नस में
भर दी है मस्ती की क्रीड़ा।
शिशु काल में सिखा दिया था
हरते रहना जग की पीड़ा।
मेरी श्वासों में जीवित है
सारे ही जग का स्पन्दन
आओ साथी साथ बजायें
तेरी वीणा मेरी वीणा।
77
दफनाकर या अग्रि देकर
कर लेना कुछ पल की क्रीड़ा।
जैसे हो, समाप्त कर देना,
मेरे नश्वर तन की पीड़ा।
प्रिय जन से है नम्र निवेदन,
बिना विवाद प्रतीक्षा करना।
क्या जाने किस द्वारा कहां, कब
लेकर फिर आ जाऊं वीणा।
78
यह तो निश्चित हुआ कि जग में
सबकी समयबद्ध है क्रीड़ा ।
पीड़ा में अन्तर ही क्या है
सुख में पीड़ा, दुख में पीड़ा।
दुख वाले से सुख वाला, पर
थोड़ा हंस भी लेता है,
जैसे रूदन, करते करते
क्षण भर हंस लेती है वीणा।
79
आओ, सुमन वाटका में हम
हंस-हंस कर कर लें, कुछ क्रीड़ा ।
शायद आने वाले पल में
भरी हुई हो कातर-पीड़ा।
यहां भविष्य किसका निश्चित है
दिनकर, का, नभ का चंदा का।
चलो साथ ले दूर जहां तक
उतनी दूर चलेगी वीणा।
80
जिसकी है उसको ही दे दो
साथ रखे क्या ऐसी क्रीड़ा ।
जितनी भी खेती उतनी ही
और अधिक पाई है पीड़ा।
वह अंधियारा ही अच्छा था
जिसमें जग को देख न पाया
उजियारे में पाया सबके
शीश धरी स्वारथ की वीणा।
81
मेरी अर्थी पर धर देना
मेरे कर्मों की सब क्रीड़ा ।
और यदि रख सको तो रखना
सारे ही जग की यह पीड़ा।
थोड़ा भार अधिक लेकर ही
चलने का आनंद मधुर है
अनजाने अनगिनत स्वरों का
भार वहन कर लेती वीणा।
82
यदि मुझे तुम देना चाहो
सकल विश्व की अनुपम क्रीड़ा ।
अलौकिक आनन्द की जिसमें
तनिक न हो प्राणों की पीड़ा।
मेरी गोद निपूती रखता
पर, ऐसा वरदान न देना,
अरे सुमन ही नहीं शूल भी
कंठ लगाती मेरी वीणा।
83
महानाद होता है जब-जब
टकराती क्रीड़ा से क्रीड़ा ।
रक्तमयी धरती पर चारों
ओर बिखर जाती है पीड़ा।
हाहाकार मचा देती है
श्रृंग-श्रृंग से टकरा देती ।
रौद्र रूप धर लेती जिस दिन
प्रलय कर देती है वीणा।
84
तुम जैसा समझ हो वैसी
अहम नहीं है मेरी क्रीड़ा ।
क्रीड़ा का यह पात्र, कि जिसमें
केवल है पीड़ा ही पीड़ा।
गरल विश्व का पीकर शंकर
कैसे आनन्दित होते थे।
अमृत ? अरे देव, तुम ले लो,
मुझे गरल की दे दो वीणा।
85
कभी धरा की हरियाली है
और कभी है नभ की क्रीड़ा
कभी कूक कोयल-पपीहे की
और कभी विरहा-सी पीड़ा।
नये रूप में सजकर प्रतिदिन
आती है यह वीणा-बाला,
कभी प्रफुल्ल हृदय को हरती
कभी शांति मरघट-सी वीणा।
86
देखें, आज किरण सूरज की
किस द्वारे करती है क्रीड़ा ।
प्राणों में उल्हास भरेगी
या देगी मृत्यु-सी पीड़ा।
अगले क्षण में क्या होता है
सुमन खिलेगा या बिखरेगा
साधक आज साथ ही लेगा
या फिर रूठ जाएगी वीणा।
87
नींद उड़ा कर ले जाती है
कभी-कभी नयनों से क्रीड़ा ।
सारी रात सुमन शैया भी
शूलों-सी देती है पीड़ा।
हृदय, कल्पना के डोले पर
चढ़कर कहां-कहां जाता है,
कितनी ही अनमोल, उस समय
माटी सी लगती है वीणा।
88
आज न छोड़ों मुझे प्रियवर
कर लेने दो जी भर क्रीड़ा ।
एक दिवस क्या, पल का धीरज
धर न सकेगी मन की पीड़ा।
कहीं नियति का हुआ निमंत्रण
और विछोह हो गया निरन्तर।
बोलो फिर किस विधि बजेगी
क्षणिक आयु की मादक वीणा।
89
नभ, धरती से करे किलोलें
कवि करता कविता से क्रीड़ा ।
पाठक इसे जगत की कहते
अरे नहीं, यह कवि की पीड़ा।
जो भीतर से बाहर आता
अन्तर का लावा होता है।
तारों से वेदना फूटती
लोग समझते गाती वीणा।
90
उन्मादित सागर की लहरें
तट से जब करती है क्रीड़ा ।
दे देकर अनवरत् थपेड़े
तट को पहुंचाती है पीड़ा।
भुक्त भोगियों ने समझा है
पीड़ा में कितनी पीड़ा है।
इसी हेतु दुख सहस्रों पाकर
जग को सुख दे जाती वीणा।
91
विश्व क्रीड़ागांन में यदि होती
केवल हंसी-ठिठोली क्रीड़ा ।
सुख इतना सम्मान न पाता
होती नहीं अगर यह पीड़ा।
पीड़ा पाकर ही धरती से
नये रूप में आता अंकुर
कठिन साधना से साधक की
मधु बिखेरती जाती वीणा।
92
मंदिर में घंटों से करते
मस्जिद, में अजान से क्रीड़ा ।
इन दोनों से अलग तीसरा
पक्ष, झेलता कितनी पीड़ा।
टीका-टिप्पणियां करते हैं,
ठेकेदार धर्म के, किन्तु
भेद न करती कभी किसी में
मेरी संकट मोटन वीणा।
93
सुमन वाटिका से अठखेली
करती पवन, रचाती क्रीड़ा ।
प्रातः काल यहां जो मिलता
उसकी हर ले जाती पीड़ा।
उदय सूर्य होने के पहिले
जो जन शैया तो तज देते,
रोग ग्रस्त होते न कभी वे
होती सदा सुखदमय वीणा।
94
मुक्ति मिलेगी क्रीड़ांगन से
किन्तु भेद-रहित हो क्रीड़ा ।
भद्र जनों ने कभी न देखी
अपनों ही अपनों की पीड़ा।
वन-उपवन जल-तरूओं जैसे
जो सुख देकर दुख ले लेते,
अरे, किसी न इन्हें दिया क्या
स्वयं जग को दे देती वीणा।
95
जात पठानी कुल युसुफ जई
आर्य संस्कृति मेरी क्रीड़ा ।
मेरा मंदिर मेरी मस्जिद
मुझे न इनसे कोई पीडा।
पथ, जैसा चाहो अपनाओं
किन्तु लक्ष्य है एक सभी का,
सार एक, पर सात सुरों से
सबका मन बहलाती वीणा।
96
तन-मन रक्त एक सबका पर,
करते अलग-अलग सब क्रीड़ा ।
किन्तु समान व्यवहार सभी के
साथ किया करती है पीड़ा।
हम विचार कर देखें तो क्या
यह पीड़ा दुख दे सकती है,
बिना किये स्पर्श कभी क्या
झंकृत हो सकती है वीणा।
97
जो वशीभूत स्वारथ के
कभी न उनको भाती क्रीड़ा ।
इस थोड़ी-सी न समझी से
पाता है जीवन भर पीड़ा।
छोड़ो निज स्वारथ की बातें
परहित में तुम जीते जाओ,
स्वयं न कभी अपने हित बजती
काष्ठ-लौह तारों की वीणा।
98
बड़ी चतुरता से देवों ने
की अमृत मंथन की क्रीड़ा ।
फुंककारों से शेषनाग की
दानव जेल रहे थे पीड़ा।
अमृत कलश निकल जब आया
देव उठाकर ले भागे थे,
दानव रहे बजाते केवल
सुध-कल्पनाओं की वीणा।
99
चार धाम के चौराहों पर
होती है चिन्तन की क्रीड़ा ।
मठाधीश की मनमानी से
साधारण जन भोगे पीड़ा।
पांड़े जी को कथा बांचने का
अनुपम अधिकार मिला है
शीष दूसरों के चढ़कर वह
सदा बजाते अपनी वीणा।
100
कह हो, किन्तु सदा उचित हो
इस नश्वर जीवन की क्रीड़ा ।
अनुचित करके अधिक भोगना
क्या है, सहस आयु की पीड़ा।
कवि ने ऐसा ही देखा है
काल कोठरी में जी जीकर
चाहे जितना भी कुछ कर लो
परन निरन्तर बजती वीणा ।
101
दीपों की पंक्तियों में देखो
शुभ्र शिखा की झिलमिल क्रीड़ा ।
माटी के दीपक में देखो
तिल तिल जलते घृत की पीड़ा।
पल-पल पल-पल तिन-तिन होना
यह शरीर भी ऐसा ही है,
सात स्वरों के मिलने पर भी
तार-तार सुर-सुर है वीणा।
102
उपदेशकजी क्यों करते हो
केवल आदर्शों की क्रीड़ा ।
कभी भोग कर भी देखी है
दीनों के पोषण की पीड़ा।
बतला कर प्रारंभ छोड़ते
दीन-हीन की करूण व्यथा को
मानव निर्मित तोड़ व्यवस्था,
जोड़ो महल-कुटी की वीणा।
103
हम चाहे तो कर सकते हैं
मिलजुलकर धरती पर क्रीड़ा ।
पानी-पवन तरू सब मिलकर
हरते हैं जगती की पीड़ा।
भेद नहीं प्रकृति कभी करती
सबको एक बराबर देती,क
सम स्वर ही में सदा गूंजती
मानस-पट पर मंगल वीणा।
104
मंगल,नहीं अमंगल करती
है, कर्मों की पावन क्रीड़ा ।
साहस के मग में न कभी भी
आ सकती है निष्ठर पीड़ा।
संकल्पों के साथ जो बढ़ता
पग, सर्वत पर जा पड़ता है,
जो वीणा को साध सकेगा
साथ उसी का देगी वीणा।
105
कर्तव्य विमुख होने पर ही
अविवेक दम्भ करते हैं क्रीड़ा ।
फिर तो क्या हैं शूल, सुमन भी
पहुंचाया करते हैं पीड़ा।
प्रत्येक वस्तु सीमाओं का
यदि, करती रहे सदा उल्लंघन,
तब क्या तुम रख सकते हो
बंधनमय, निज की यह वीणा।
106
पाषाणों पर शीष पटक कर
जीतनी चाहो कर लो क्रीड़ा ।
अपने तन को अपने मन को
चाहे जितनी दे लो पीड़ा।
पर न कभी विश्राम मिलेगा
निजी स्वार्थों के बंधन से
छुटकारा दे सकती केवल
माता और पिता की वीणा ।
107
जो गो गया उसे बिसराकर
कर लो अब ऐसी कुछ क्रीड़ा ।
वर्तमान हो सुखद तुम्हारा
हो न भविष्य में कोई पीड़ा।
कल देखा तो नहीं किसी ने
पर आभास तो हो जाता है,
सरे तार खिंचे हो सम पर
तब, सुन्दर स्वर देती वीणा।
108
शिला खंड टकराते हैं जब
नियति हंस-हंस करती क्रीड़ा ।
कैसा सोच विचार कर रहे
भोगो, जो होती है पीड़ा।
अवसर गया हाथ से अपने
पकड़ उसे पाना मुश्लिम है,
टूटा तार एक भी सुर से
बेसुर हो जाती है वीणा।
109
जग में ऐसा जीवन जीना
बांट-बांट कर करना क्रीड़ा ।
देव दधीची से दानी बन
हर लेना जगती की पीड़ा।
एक नूर से सब जग उपजा
राममयी सारी लीलायें,
परहित में जीकर मर जाना
सबकों पाठ पढ़ाती वीणा।
110
तरूओं पर पक्षिओं का कलरव
धरती पर पशुओं की क्रीड़ा ।
काल किन्तु पहुंचाता सबको
एक प्रकार से अंतिम पीड़ा।
सत्य सदा अन्तिम होता है
यह स्वीकार यदि हम कर लें।
शूलों से पूरित जग में चल
क्यों कर कष्ट उठाये वीणा।
111
काली-तुलसी मीर-कबीरा
मीरा कर गई अद्भुत क्रीड़ा ।
अरे कौन पहिचान सका था
नानक-अकबर सूर की पीड़ा।
इनके मन तो थे वैरागी
मानवता इन पर उतरी थी,
जीवन-रहित मूक, पर गाती
राग इन्हीं से लेकर वीणा।
112
खेली अपने-अपने रंग से
पर, न सभी को भाई क्रीड़ा ।
परवशता में ज्यों-ज्यो डूबे
और निकट ही आई पीड़ा।
केवल एक बचाने वाला
नौका पार लगाने वाला,
दूर क्षितिज के पास खड़ाजो
हाथ में ले जीवन-वीणा।
113
आज मौन निर्जीव पड़ी क्यों
कल तक तो करती थी क्रीड़ा ।
अरी, और दो चार दिवस तू
झेल न पाई जग की पीड़ा।
देख मुझे मैं, ठोकर खाती
भूख-प्यासी, पर चलती हूं,
आशा की गति पावों में ले
हाथों में ले श्रम की वीणा।
114
शांत क्लांत से विजय भवन से
गई, कहां उत्सव की क्रीड़ा ।
कल तक कुटियों पर हंसता था
आज उसी के आंगन पीड़ा।
इसे समय का फेर कहो, या,
इसे अधीरता का प्रमाण दो,
तुम कर्महीन, अब करो स्मरण
हाथों में ले सुमिरन वीणा।
115
अपने आंगन में उसको भी
कल लेने दो कुछ क्रीड़ा ।
साथ तुम्हारे हंस लेता तो
कम हो जाती उसकी पीड़ा।
किये बिना असहयोग यहां तो
क्षणिक श्वास लेना दुष्कर है,
बिना श्रम किये सप्तक स्वर से
अपने स्वर न मिलाती वीणा।
116
उपनव में हो खड़े अकेले
कर न सकोगे कोई क्रीड़ा ।
और अकेले रह कर सहना
अति कठिन है जग की पीड़ा।
पथ में जो भी पड़े दिखाई
उसको कंठ लगाते, जाना,
बिना अंगुलियों के सहयोग से
बजी न अब तक कोई वीणा।
117
आंगन से मरघट तक देखो
साथ-सात जाती है क्रीड़ा ।
अन्तिम चिन्गारी बुझने तक
तन का साथ न छोड़े पीड़ा।
हो जाता तब शांत सबी कुछ
अरे ,याद तक मिट जाती है
किन्तु सरस्वती साधक जन के
साथ सदा रहती है वीणा।
118
जो जन स्वप्नों के आंचल में
लिपटे, करते-रहते क्रीड़ा ।
अरे, उन्हें तो अन्तिम श्वासों
तक, सहनी पड़ती है पीड़ा।
चलो, स्वप्न के अंधियारों से
दिनकर के आंगन को देखें
कुछ अधरों पर मुरनी धर दें
कुछ हाथों में दे दें वीणा।
119
प्राची की लाली तो देखो
आतुर है करने को क्रीड़ा ।
अभी प्रकाश दिनकर लायेगा
हर लेगा धरती की पीड़ा।
किन्तु प्रकृति ही नहीं अकेली
दुख का निवारण कर पायेगी,
साथ हमें भी चलना होगा
प्रकृति के संग लेकर वीणा।
120
इन तरूओं के साथ निष्ठरों
अरे, करो मत ऐसी क्रीड़ा ।
परहित में यह जीते-मरते
सुख न कभी, पीड़ा ही पीड़ा।
जीवन के हर कंगूर पर
वृक्ष सदाकरते हैं छाया,
ग्रीष्म काल के कठिन क्षणों में
सुखद सुरभी बन जाती वीणा।
121
इस मधु घट पर मैं खड़ा हुआ
करने को हूं कुछ नव क्रीड़ा ।
हर बार किन्तु बाधा बनकर
सम्मुख आ खड़ी हुई पीड़ा।
प्रयास विफल तो हो सकता
असफल न कभी, पर हो सकता,
टूटा जो कभी निश्चय मेरा
फिर याद करा देती वीणा।
122
नारी का जिस घर मान न हो
उस घर मेंसदा कलह- क्रीड़ा ।
वह घर है भूत-पिशाचों का
करती है नृत्य जहां पीड़ा।
संकोच लाज सब छोड़ रहे
कर रहे समर्पित अग्नि को,
लक्ष्मी फिर बन सहायक क्या
सरस्वती बजाये क्या वीणा।
123
सर्व विदित है संस्कृति के
उन्नायक कृष्णा की क्रीड़ा ।
सह न सका था कंस कदाचित
सत्य-अहिंसा की महा पीड़ा।
सत्य –असत्य का युद्ध सदा से
बार-बार क्यों होता आया,
शून्य हृदय क्या समझ सकेगा
सत्य हृदयच की मादक वीणा।
124
नयनोंके काजल से आंसू
करते ही रहते हैं क्रीड़ा ।
कभी खुशी बनकर बहते हैं
और कभी हृदय की पीड़ा।
दुख-सुख में अन्तर है कैसा
एक नयन जिनका अद्घम है
जिन तारों से सुख देती है
उनसे ही दुख देती वीणा।
125
सकल विश्व का मालिक निशिदन
करता ही रहता है क्रीड़ा ।
उसका है अधिकार कि किसको
कितना सुख दे कितनी पीड़ा।
जितनी भी हो करो याचना
ईश-भवन में शीश नवाकर,
यही कृपा समझो कि बराबर
बजा रहा वह सबकी वीणा।
126
जितनी भी मैं कर सकता था
उतनी कर ली मैंने क्रीड़ा ।
क्षण भर का सुख पाने हेतु
झेल रहा था अब तक पीड़ा।
माँ, सरस्वती चरण में तेरे
अब करता हूं इसे समर्पित
तू चाहे तो विश्व-विजयी कर
या फिर, मौन बनादे वीणा।
127
तीन काल के क्रीड़ांगन में
सहसों रूप दिखाती क्रीड़ा ।
पता नहीं किस द्वार संभारे
या किस द्वार पछाड़े पीड़ा।
हर द्वारे पर ध्यान लगाकर
शीश नवाकर बढ़ते जाना,
मद में शीश तनिक उठते ही
खन्ड-खन्ड कर देती वीणा।
128
गरमी-सरदी या बरखा में
अपना मन न बदलती क्रीड़ा ।
जिस क्षण चाहे बिना निमंत्रण
बेखटके आ जाती पीड़ा।
पीने वाला हो सचेत तो
पांव पकड़ झुक जाती बाला
मौसम की दासी बन जाती
छोड़ कामनाओं की वीणा ।
129
कौन यहां से किस प्रकार से
कर समाप्त जाएगा क्रीड़ा ।
कौन यहां से किस प्रकार की
लेकर साथ जाएगा पीड़ा।
होगा जिस दिन निर्णायक पल
अरे, सामने सब आयेगा
पल-पल की क्रीड़ा-पीड़ा का
सब हिसाब कर देगी वीणा।
130
जब समाज में आ जाती है
चरित्रहीनता की धुत क्रीड़ा।
तभी सभ्यता रो उठती है
बेलगाम हो जाती पीड़ा।
क्या से क्या हो गये आज
हम, अभी और क्या होना है,
अधिक नहीं रह पायेगी अब
खरी, पूर्वजनों की वह वीणा।
131
बिना भेद निर्णय करने से
सम्मानित होती है क्रीड़ा।
जो निर्णय में भेद करेगी
उसका फल है निश्चित पीड़ा।
सोच समझ कर करो फैसला
हर निर्णय तुमको करना है,
अपना शीश उठाकर तुमको
स्वयं लेकर चलना है वीणा।
132
गीता-कुरान सगे सम्बन्धी
पृष्ठ-पृष्ठ से करता क्रीड़ा।
मजहब के ठेकेदारों ने
कभी न जानी मेरी पीड़ा।
बंजारे का रूप लिये मैं
उन राहों में बढ़ता जाता
जिन राहों में जीवन मधु
संगीत सुनाती है वीणा।
133
मरघट सी है जहां शांति
वहां कहां जीवन की क्रीड़ा।
जिन अधरों पर प्रसन्नतायें
उन मुखड़ों पर कैसी पीड़ा।
प्रयत्न करो हंसते रहने का
तूफानों के संग बहने का,
पथ चाहे कितना हो दूर्गम,
स्वयं ही पार करेगी वीणा।
134
बीता पल बीती सो बीता
बीती नहीं किन्तु यह क्रीड़ा।
जिसमें सुख के कुछ क्षण है
और असहनीय भीषण पीड़ा।
मैं, कितना धीरज धर जीता
जान-बुझकर विष को पीता,
अरे, कभी तो अमृत का घट
कर में पकड़ा देगी वीणा।
135
यह विस्तार महानगरों का
सीमा विहीन जिनकी क्रीड़ा।
उपर की चमक-धमक सब, पर,
अन्तर में जिनके है पीड़ा।
सब ओर नजर डालो, केवल
दिखते हैं खड़े महल ऊँचे
सब तो है स्वर्ग सदृश्य यहां
सबल, अदृश्य शांति की वीणा।
136
जितनी जी चाहे ले लेना
मुझसे मुस्कानों की क्रीड़ा।
पर लेकर मुस्कानें मेरी
कभी न देना इनको पीड़ा।
बड़े जतन से पाल पोस कर
मैंने इनको बड़ा किया है,
मुझे, प्राण से अधिक प्रिय है
मुस्कानों की दुर्लभ वीणा।
137
कर दे चहुं ओर हरियाली
फैलै दें क्रीड़ा ही क्रीड़ा।
चले न नभ तक शीश उठाकर
खुशहाली के सम्मुख पीड़ा।
उद्यानों में कोयल कूके
घर-घर में मानव किलकारी,
और गगन पथ से नित उतरे
धरती पर देवों की वीणा।
138
बहुत हो चुकी मारा-मारी
रक्त पात की भीषण क्रीड़ा।
वर्तमान पीढ़ी को कब तक
सहनी होगी दुख की पीड़ा।
बहुत हो चुकते अब तो जागों
मोल मनुजता को पहचानों
सदियों से पैगाम दे रही
पंचशील की पावन वीणा।
139
मंदिर या मस्जिद को तोड़ों
कब कहती है मेरी क्रीड़ा।
पर, इसका कट्टर हो जाना
मेरे क्रीड़ांगन की पीड़ा।
सब करें मुक्त आना-जाना
निर्भीक, जहां करना चाहे,
मन करे वहां जाकर छेड़े
आराधाक अपनी मन वीणा।
140
भाई बहिन के अमर प्रेम की
यह रक्षा बंधन है क्रीड़ा।
हरियाली धरती की हरती
भाई, बहि की हरता पीड़ा।
दो धागों से बंधने वाला
यह अटूट बंधन कैसा है,
लौह तार से बांध स्वयं को
बंधन-बोध कराती वीणा।
141
शांति, धैर्य और सयंम से
सहज हुआ करती है क्रीड़ा।
सफल कार्य में अति शीघ्रता
घातक हो जाती है पीड़ा।
वे जन ही साधारण होते
जिन्हें काल का ज्ञान न होता
सदा पात्र को परख निरख कर
पास तभी जाती है वीणा।
142
जिनके अधरों पर होती है
मुस्कानोंकी अनुपम क्रीड़ा।
कोई क्या समझेगा उनके
भीतर की दावानल पीड़ा।
प्रातः काल सुरभि सौरभ से
मंडित द्वार-द्वार कर जाती,
सुख देकर क्या पाती है
सुरभी के सौरभ की वीणा।
143
जिसने रात जाग कर काटी
की ना सेज सुमन से क्रीड़ा।
वही जातना है किया होती
अरे, प्रतीक्षा कीयह पीड़ा।
तुम अधरों पर जब जब धरते
केवल तीन-चार मधु बूंदें,
कितनी व्यग्र हुआ करती तब
और अधिक पाने को वीणा।
144
आओ मेरे साथ करो तुम
उदर हेतु कुछ पल की क्रीड़ा।
तब जानोगे, एरे, यथार्थ में
क्या होती है श्रम की पीड़ा।
कड़ी धूप में पाषाणों को
तोड़-तोड़ जो महल बनाता
उसके भाग्य न सुख होता है
केवल श्रम ही श्रम की वीणा।
145
कहां मिलेगी आनंदों की
ऐसी स्वर्गमयी मधु क्रीड़ा।
यह पावन धरती भारत की
माता बन हरती जग पीड़ा।
एक-एक कण से मधु झलके
पग-पग पर पराग उठता है,
विश्व पटल के धरा-गगन में
धुम पचाती भारत-वीणा।
किसने की है पाषाणों में
मानव के प्राणों की क्रीड़ा।
146
किसने की है पाषाणों में
मानव के प्राणों की क्रीड़ा ।
अंग-अंग को छेद-छेद कर
अन्तहीन दे डाली पीड़ा ।
सुन्दर को सुन्दरतम करके
जिसने अद्भुत रूप गढ़ा है,
उसी कला के महादेव को
सहसों शीश नवाती वीणा।
147
मुझे न अग्नि अर्पित करना
और न दफनाने की क्रीड़ा।
मेरी पवित्र देह को होगी
इन क्रियाओं से अति पीडा़।
मुझे डाल देना निर्जन में
किसी काम तो आ पाऊंगा,
रखने पर निष्क्रिय होती
बजने पर जी उठती वीणा।
148
आने दो अब तूफान भयंकरक
होने दो धरती पर क्रीड़ा।
एक बार ही मिटे धरा से
बार-बार की दारूण पीड़ा।
मैं हूं तेरे साथ प्रलयंकर
एक-एक सब बतला दूंगा,
कहां धरी है लुका-छिपाकर
मानव ने दुख-सुख की वीणा।
149
रात बिरात किसी क्षण होगी
इस तन से माटी की क्रीड़ा।
तब जानेगा, जीवन भर में
कभी न जिसने जानी पीड़ा।
शूल सुमन की पंखुड़ियों में
बिंध कर असीम वेदना देता,
रो उठती है हंसते-हंसते
जब-जब हुई कष्ट में वीणा।
150
वीणा लिख, अब शांत हो रही
कलम और स्याही की क्रीड़ा।
यह मेरा दुर्भाग्य कि तुमने
कभी न समझी मेरी पीड़ा।
तुम जानो या मत जानो पर
हुई साधना मेरी पूरी,
सरस्वती मां के चरम-कमल में
चला, चढ़ाकर अपनी वीणा।
151
ज्वार हृदय में उठ आया है
करने दो सागर को क्रीड़ा।
जब ही जल होगा धरती पर
मिट जाएगी थल की पीड़ा।
यह विनाश का नहीं, भविष्य
संकेत पूर्ण परिवर्तन का है
कभी-कभार ही रौद्र रूप में
बजती शांत भुवन की वीणा।
152
मैं चाहूं तो करूं इसी क्षण
ऐसी विकट प्रलय की क्रीड़ा।
धरती से अम्बर तर केवल
दीख पड़े पीड़ा ही पीड़ा।
किन्तु प्राणियों के हित मैंने
हठ के साथ किया समझौता
कभी न बदले वाला कोई,
राग सुनाती मेरी वीणा।
153
कौन यहां रहने को आया
कौन निरंतर करता क्रीड़ा।
न कोई सुख लेकर आया
और न कोई लाया पीड़ा।
सारा कुछ कर्मों का फल है
जितना भी जिसका आंचल है
जिसने भी जितना मांगा है
उतना ही भर देती वीणा।
154
कभी किसी को देश, न देना
करें स्वतंत्र सभी जन क्रीड़ा।
पर यह ध्यान रहे क्रीड़ा से
पहुंचचे नहीं किसी को पीड़ा।
हिमगिरी से भी ऊंचे उठ कर
गंगाजल से बहते रहना
साधारण से रहकर रखना
उच्च विचारों की निज वीणा।
155
जन सेवक के स्वागत में आ
साधारण जन करते क्रीड़ा।
जन सेवक पर नहीं समझता
साधारण जन की यह पीड़ा।
जन सेवक निज स्वार्थ साधकर
ऊंचे महल खड़े करता है
ऐसे ऊंचे महलों वाली
कभी न सुख पहुचाती वीणा।
156
आओ सोचें आज सभी हम
इस जीवन की क्या है क्रीड़ा।
घबराना मत कभी विचारते
समय, तोड़ दे साहस पीड़ा।
अकसर ऐसा हो जाता है
सुपथ शूल से भर जाता है,
तबी अंजली भर सुमनों से
शुभ विचार दे जाती वीणा।
157
घबराने लगता है मन तब
विगत स्मरण करती क्रीड़ा।
तभी द्वार पर दस्तक देकर
आन खड़ी होती है पीड़ा।
अरे, भूल रे बीते पल को
देख सुमन का क्षम-भर जीवन,
जैसे भी जी सको जियो, पर
तजो न मुस्कानों की वीणा।
158
साहस-हीन पुरुष क्या जाने
शूलों पर चलने के क्रीड़ा।
अरे उन्हें तो स्वर्ण-शैय्या भी
देती है शूलों सी पीड़ा।
जिसने सदा स्वयं हित साधा,
उस पौरूष से क्या आशाएं
उनके कर में कभी न शोभित
हो पती है जन-हित वीणा।
159
यहीं नर्क है यहीं स्वर्ग है
यहीं हिसाब कर देगी क्रीड़ा।
फिर क्यों झेल रहे हो, साथी
प्राणों पर, पर-सुख की पीड़ा।
पथ में सुमन बिछाकर कर लें
आने वाले कल का स्वागत,
ऐसे मधुर भाव लेकर जो
चला, अमर है उसकी वीणा।
160
मैंने कभीन चाहा कोई
मेरे साथ करे यह क्रीड़ा।
क्योंकि मेरे मधु पात्र में
केवल पीड़ा ही बस पीड़ा।
जाओ और कहीं जाकर अब
तुम अपना मन बहला लेना
मेरा ही मन बहला न सके
मेरे ही स्वर मेरी वीणा।
161
विगत दिनों की जाने वाली
आज याद आती है क्रीड़ा।
जिसे आज में झेल रहा हूं
कहां गई थी तब वह पीड़ा।
जीवन का यह अन्तर कैसा
अब तक नहीं समझ पाया हूं,
सात स्वरों से जोड़ न पाई
नाता, निष्ठिर जीवन वीणा।
162
नम्र निवेदन मुझे न देना
बार-बार जन्मों की क्रीड़ा।
भूले नहीं भुला पाता हूं
केवल इसी जन्म की पीड़ा।
दफनाओं तो इतना गहरा
काल खींच पाये न बाहर,
और लालसा पुनः धरा पर
बजा न पाये अपनी वीणा।
163
आओ हम सब अब, मिल जुलकर
आज करें कुछ ऐसी क्रीड़ा।
सुख का जल अम्बर से बरसे
मिट जाये धरती की पीड़ा।
वैरागी मन ले इकतारा
द्वार-द्वार पर अलख जगायें,
अधरों की मुस्काने बनकर
घर-घर पवन बजाये वीणा।
164
बंधु जनों के साथ मुसलमां
करता कफन-दफन की क्रीड़ा।
अन्त समय हिन्दु ने झेली
दारूण दाह जलन की पीड़ा।
जब तक रही आत्मा तन में
किसने आंख उठाकर देखा,
जीते जी न किसी ने पूछा
कैसे बजी जनम की वीणा।
165
माता तेरे लाल बराबर
करते नहीं बराबर क्रीड़ा।
काट रहे हैं फूटपाथों पर
सर्दी-गर्मी वाली पीड़ा।
और बहुत ऐसे हैं जो बस
केवल पानी पीकर जीते,
और बहुत से समझ न पाते
क्या होती है सुख की पीड़ा।
166
किसी समय भी जा सकता हूं
करते-करते जीवन क्रीड़ा।
इसीलिए तो ध्यान न देता
आती है जब कोई पीड़ा।
भूतकाल से नेह न मेरा
नहीं भविष्य का कुछ आकर्षण
वर्तमान मेरा अपना है
श्वांस संगति कर में वीणा।
167
मैं अंजान अपरितिच लेखक
कलम-कामिनी मेरी क्रीड़ा।
रात बिरात निकट आ मेरे
हर लेती है मेरी पीड़ा।
मेरे जीवन की किताब में
शब्दों का व्यापार नहीं है,
भावों के नूतन रंगों से
सजा सका हूं मन की वीणा।
168
अनगिनत दिवस-रात में होते
देखी, भाव-कलम की क्रीड़ा।
किसने सुख से आंख भिगाई
किसने दुख से पाई पीड़ा
अपलक पथ निहारते बीते
कितने पल-प्रसून सुहाने,
ले-दे कर ही बजा सकी है
मेरी-कविता सुख की वीणा।
Friday, June 1, 2007
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