Friday, June 1, 2007

आशीर्वचन- राम कृपाल सिंह



श्री हिदायत अली ‘कमलाकर’ हिन्दी के जाने-माने कवि हैं। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है। पेशे से वे खेलकूद (क्रीड़ा) अधिकारी हैं व समर्पित खिलाड़ी हैं, किन्तु स्वभाव से कवि हैं। उम्र से बुजुर्ग हैं, लेकिन उत्साह में नौजवान हैं। मातृभाषा उर्दू है, किन्तु लेखन कार्य हिन्दी में करते हैं। जहां तक उनके शिल्प का संबंध है, वह गतिमय है। जीवन को इन्होंने लयमय स्वीकार किया है, जीवनकी यति भंग नहीं होती, निरन्तर चलती रहती है, चाहे वह क्रीड़ा, पीड़ा हो अथवा वीणा के रूप में हो।

श्री कमलाकर जी ने अपने कविता को ‘वीणा’नाम दिया है। ‘वीणा’ एक यंत्र है, जो तारों के संयोग से बना होता है, तारों पर उंगलियों की थिरकन से मधुर घोष होता है। यह सृष्टि का आदि वाद्य है तभी ज्ञान एवं वैराग्य का द्योतक है। विद्या की देवी सरस्वती के हाथों में मंडित होने से उनका नाम ‘वीणा वादिनी’ हुआ और यह ज्ञान का प्रतीक कहलाया।

भाई कमलाकर जी द्वारा सृजित ‘वीणा’ में जीवन के अनन्य पहलुओं को मात्र ‘क्रीड़ा’ और ‘पीड़ा’ में पिरोकर हृदय के तारों को झंकृत किया है। उनकी यह अनूल्य कृति साहित्य जगत को समृद्ध करने में समस्थ होगी तथा समाज के इंसानों को अनेक नेक बातें पढ़ने एवं सीखने को मिलेंगी।
मैं उनके मंगलमय भविष्य की कामना करता हूँ।


(प्रो. रामकृपाल सिंह)
कुलपति
गुरु घासीदास विश्वविद्यालय
बिलासपुर (म.प्र.)

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