इसमें जो है इसे मैं कविता नहीं मानता । हाँ, कभी मन की उलझन से फूटी हुई कल्पना कुछ ऐसा रूप ले ले जो कविता सा लगे तो इसे कविता माना जाये। कविता मात्र कविता नहीं परिशतिश है पूजा है जो कठोर साधना से प्रकट होती है, वर्तमान की बात ही निराली है पूरा का पूरा वर्तमान ही कविता से रंगा पड़ा है, रंगों के संयोजन का तमीज हो यह आवश्यक नहीं है, ऐसे बिना रंग-संयोजन मेरी यह रचना है जिसका नाम पड़ गया है ‘कहीं से भी पढ़ लो’ सपाट वे लोस जैसा मेरा जीवन या एक कोरा पन्ना ।
प्रकाशक डॉ. साजिया अली मेरी बहू है इसके पूर्व मेरी पुस्तक ‘कालजयी’ भी प्रकाशित करा चुकी है। पता नहीं ‘कहीं से भी पढ़ लो’ में उसने क्या पढ़ा और प्रकाशित करा दिया सो धन्यवाद की पात्र। कहने के लिये शेष नहीं है।
0कमलाकर
फाल्गुन पंचमी
2007 जनवरी
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