कहीं से भी पढ़ लो
मृत्यु बहुत पास खड़ी है
जीवन की समस्त
उपलब्धियों से बड़ी होकर
मौन होकर हम महसूस करें
शांति पास आती जायेगी
जीवन की एक समस्या स्वमेव
सुलझती जायेगी ।1।
मृत्यु बहुत पास खड़ी है
जीवन की समस्त
उपलब्धियों से बड़ी होकर
मौन होकर हम महसूस करें
शांति पास आती जायेगी
जीवन की एक समस्या स्वमेव
सुलझती जायेगी ।1।
भूख न लगने का उपाय क्या है
एक आवश्यकता है
जिसे पूर्ण करने का नाम
श्रम के अतिरिक्त कुछ नहीं ।2।
मैं सुख-दुख में तेरी इच्छा तक
जीता रहूंगा, जब तक तू चाहे
किन्तु एक पल भी तेरी इच्छा न हो
यही पाप की परिभाषा है ।3।
नहीं जानता कब जाना होगा
किन्तु जाना होगा पूर्ण विश्वास के साथ
यह विश्वास भी ईश्वर है।
जिसे कोई नहीं मानता ।4।
क्यों कहाँ से आये हो
कोई नहीं पूछता
कोई नहीं कहता
रुकने के लिए कहे भी कैसे
सत्य से भय लगता है ।5।
जकड़ दो तन को
लोह जंजीरों से
बांध दो पाषाण स्तम्भ से
कहां बांध सके मेरी आत्मा को
कहां रोक सके स्वच्छ निर्मल आकाश में
उड़ने से उसे ।6।
सब चाहते हैं स्वतंत्र होना
स्वतंत्रता, जो आचरण व्यवहार है
और हम आचरण व्यवहार नहीं जानते
फिर कैसे बचाओगे
स्वतंत्रता को ।7।
सब तो पढ़ लिया मैंने
शेष बचा ही क्या है
किन्तु क्या मैं मनुष्य हो सका
इतना पढ़ने के पश्चात ।8।
रक्त पात से बचने का
अथक प्रयास किया
बच न सका रक्त पात से
बचता भी कैसे
मैं, शांति से जीना कहां चाहता हूं ।9।
दौड़ में सम्मिलित है सब
किन्तु कोई प्रथम आना नहीं चाहता
सब जानते हैं, प्रथम आने का अर्थ
दौड़ से सदा के लिये
बाहर हो जाना ।10।
मेरा मनुष्य होना ही व्यर्थ हुआ
मनुष्य होकर बंट गया हूं
नाम से, धर्म से, जात से
करीब होकर भी
मनुष्यता की आत्मा से
कट गया हूं ।11।
पहिले होता था
अब नहीं होता भूख से कष्ट
जान सका हूं जब से
भूख की कामना
जो खा जाना चाहती है
मुझे अंत तक ।12।
निरंतर चला आ रहा हूं मैं
और कब तक चलता रहूंगा
थक कर बैठ जाता हूं
कुछ समय के लिये
फिर चलने लगता हूं
सतत्-निर्बाध गति से ।13।
सत्य को शब्द कोश से निकाल दो
इसें पढ़कर सुनकर बोलकर
कष्ट होता है
ठहरो सत्य को निकाल दोगे
तो असत्य को काटने वाला
बचेगा ही कौन ।14।
अंधकार से भागो मन
सफर जारी रखो
भविष्य को, रोशनी
तम से ही मिलती है ।15।
राजवंशों का वृतान्त पढ़ने से
वर्तमान को देखकर
कष्ट नहीं होता
होता, यदि कहिं अन्तर
दिखाई पड़ता, तब । 16।
कुछ कह सकूं किसी से
कि सुनो, पर सुने कौन
पर लगा कर भाग रहे है सब
उसी ओर बचने के लिये
जहां से आये है ।17।
क्या हुआ वह वृक्ष के नीचे
पसरी हुई शीतल छाया को
कुछ भी तो नहीं, सूरज से
मित्रता करके, धूप ने दायरा
बढ़ा लिया है ।18।
अब सन्ध्या गोधूलि बेला
नहीं कहलाती
गाय भी तो अब
समय से नहीं लौटती
बछड़े को दूध पिलाने को । 19।
विनम्रता कब तक छली जायेगी
बनावटी मुस्कानों से
कब तक दिखाएं जायेंगे स्वप्न
क्वांरी आंखों को छलने के लिये
रह नहीं सकती वास्तविकता
अधिक दिन, असत्य के वलय में ।20।
धन गर्जना, दान का प्रतीक
सिंह नाद, भयातुर वातावरण
चयन हमें करना है
शांति या विध्वंस ।21।
विचारों से, स्वभाव से
होते जा रहे हैं हम बोने
बिना सोचे-समझे इस
अनंत यात्रा में किस पड़ाव पर रुकना पडे़।22।
आकाश दर आकाश
कहां तक स्पर्श करोगे आकाश का
आओं, वातावरण बदल दे
अपने आस-पास का ।23।
व्यवस्था पर ध्यान दो
चरमराने के पूर्व ही रोक लों
अन्यथा किसका घर बचेगा
किसकी गली शेष रहेगी
श्मशान तक जाने के लिये। 24।
बदला तो कुछ भी नहीं है
ज्यों का त्यों सनातन जैसा
बदलते है हम रोज ही
अपने स्वभाव को
वस्त्रों की तरह ।25।
ऊंचे प्रासाद-नीची झोपड़ियां
क्या अन्तर है, सुविधा का
किन्तु भूख तो दोनों को लगती है
जो दोनों को सोने नहीं देती । 26।
आस्था और यथार्थ के मिलन से
विश्वास से विकसित सुमनो को
नोचने के लिये बड़े हाथ
अत्याचार की नई परिभाषा
लिखने को आतुर है ।27।
कुछ भी नहीं लिखा जा सकता
उस समय तक जब तक
भावनाओं पर संगीनों का पहरा है
उभारा नहीं जा सकता कोई चित्र
कोरे कागजों पर संगीनों के साये में ।28।
नदी किसी की दास नहीं है
बहती रहेगी आदिकाल तक
पथ मोड़ा जा सकता है, नदी का
बहाव नहीं, वह जीना जानती है।29।
क्या हुआ है आदमी को
कहना बड़ा कठिन है
अचानक दीयों को बुझाने लगा
शायद ! नीरों का जन्म हो गया
बांसुरी की आवाज आ रही है ।30।
नियति निष्ठुर नहीं है, न अशक्त
कि तुम, उसके विरुद्ध दंभ भर सको
व्यर्थ पाप की गठरी शीष पर मत उठाओ
यदि उत्तर देना ही हुआ
तब क्या करोगे ।31।
कायरों की भांति जीना
समय का दुरुपयोग करना है
समय का मूल्य जानकर आगे बढ़ना
साहस का परिचायक है ।32।
सहनशीलता, सफलता का प्रथम सोपान
विनम्रता दूसरा सोपान
संकल्प लक्ष्य तक पहुंच जाना
यही जीवन का प्रमुख अर्थ है ।33।
वर्तमान की घटना
भविष्य की आधार शिला है
आवश्यकता इस बात की है
इसे रखा कैसे जाये।34।
बहुत ऊंचा उठ गया था मैं
नीचे अपने भूल गया था देखना
अपने उन लोगों को जिनके साथ
खेला कूदा बड़ा हुआ था
भूल गया था भूख प्यास को
अच्छा हुआ आ गिरा वहीं
जहां से ऊंचा उठ गया था ।35।
मैं पवित्र पुस्तकों को
पेपर वेट की तरह काम में लेता हूं
ताकि दबा रहूँ उस भार के नीचे
और न हो सकूं कभी
मनुष्यता के दायरे से बाहर ।36।
संस्कारित शब्द, सत्य का रूप लेकर
यथार्थ की कथा बनते है
और बनते हैं मनुष्यों के अमर होने का कारण ?
यदि हम शब्द को
संस्कारिक कर सके तब ।37।
तुम केवल मरने के लिये नहीं
कुछ करने के लिये आये हो
कैसे मरोगे, अनुशासित
मनुष्य की तरह
या वे लगाम नायक
की तरह ।38।
भूल जाता है मनुष्य
अतीत के पन्नों पर लिखी कहानी
और दोहराने लगता है बार-बार
उसी कहानी को
झूठ सच को परखे बिना ।39।
सत्य प्रकट होता है
दो व्यक्तियों के मिलने से
किन्तु कह सकना कठिन है
सत्य किसके पास है
क्योंकि दोनों ही
सत्यवादी होने का प्रयास करते हैं ।40।
देखने से ही स्वप्न पूरे नहीं होते
पूरा होने के लिये स्वप्न
परिश्रम पर निर्भर है ।14।
तुम मुझे क्या दोगे
दोगे तो किसी न किसी रूप में
वापिस लेने का प्रयास करोगे
फिर तुमसे क्या मांगू
क्यों न उससे मांगू
जो मात्र देता है
और बस देता ही है ।42।
जिस दिन मेरे पास कुछ न होगा
न सुधा न तृष्णा न मोह
हो जायेगा एकाकार मेरा
निराकार से
उसी दिन में चल दूंगा
अपनी अनंत यात्रा पर ।43।
जय-पराजय का निर्णय
पूर्व में ही हो चुका है
अब तो मात्र
प्रदर्शन ही शेष है ।44।
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