Friday, June 1, 2007
4.करना भी न छलना
पथिक बनो तो कठिन डबर में
हंस-हंस कर ही चलना ।
दीप बनो तो आंधी में भी
हंसते-हंसते जलना ।
सूर्य बनो तो शांत संध्या में
हंस-हंस कर ही ढलना ।
प्राची की किरणों संग निकलो
हसते हुये निकलना ।
श्रम को साध्य बनाकर मांगो
सम्मुख हाथ न मलना ।
वसुन्धऱा की हरीतिमा बन
नित-नित प्रतिपल जलना ।
असहायों के सेवक बनकर
क्षण-क्षण हिम सा गलना ।
मित्र बनो तो मित्रों के संग
करना भी न छलना ।
वजन दिया तो पूरा करना
अंतिम तक न बदलना ।
सदा सुमन से प्रिय रहना
शूलो सा मत सलना ।
वृक्ष बनो तो सदा
दूसरों के हित में ही फलना ।
सुरभि सा प्रवाहित रहना
स्वास-स्वास में पलना ।
0000000
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment