“राम संस्कारों के संयत-संयम सौरभ हैं,
भारतीय संस्कृति-सभ्यता के गौरव है।।”
‘समर्थ राम’ में कवि ने राम को एक चिन्तक मनीषी के रूप में प्रस्तुत किया है। वस्तुतः कवि ने अपने स्वयं के चिन्तन को राम और लक्ष्मण के माध्यम से प्रस्तुत किया है। राम तो स्वयं सर्वसमर्थ है। वह साक्षात् परमात्मा के अंश है, किन्तु मानव रूप में अवतार लेने के कारण उन्हें अपने बनाए हुए विधि-विधान का पालन करना पड़ रहा है-
“क्या भविष्य के गर्त में है,
राम सब कुछ जानते हैं,
किन्तु फिर भी मौन बैठे,
लेख विधि का मानते हैं।”
कवि की चिन्ता युद्ध की विभिषिका से है । राम के माध्यम से कवि अपनी यह चिंता व्यक्त करते हुए कहता है-
“युद्ध के पश्चात् बचता शेष क्या,
अस्थियाँ चबाते श्वांस रक्त पीते हैं
उनके भी तो मरा हुआ जानो,
जो निर्बल निस्सहाय पड़े जीते हैं।”
राम युद्ध टालना चाहते थे, उनके मन में विचार आता है कि क्या मात्र एक नारी के लिए यह युद्ध, हजारों लोगों की बलि क्या उचित है-
“अनमना सा राम का मन
सोचता था बार-बार
एक नारी के लिए हो युद्ध
मेरा ही सर्वश्रेष्ठ जीवन का सहारा।।”
कृष्ण की भांति राम को भी बोध होता है कि इस कर्मभूमि में सिर्फ कर्म पर हमारा अधिकार है, भाग्य नियति पर नहीं-
“घट रहा है जो उसे तो भोगना है,
मनुष्य ही क्या देवगण कब रोक पाये,
देव हो या कोई साधारण मनुष्य हो,
सब खड़े हैं शीश को अने नवाये।।”
यह पुण्य विचार आते ही चिन्तक प्रभु राम की सारी शंकायें मिट गयी-
“नीरज सा खिल उठा श्री मुख उठे राम
मनोमालिन्य की नहीं तनिक भी मुख पर छाया,
पग-पग पर जय-विजय चली, अहो राम चले,
ज्योतिर्मय हो उठा ब्रह्म नवदीप जलाया।।”
अन्ततोगत्वा कवि भी यह स्वीकार करता है कि मानवता की रक्षा हेतु कभी-कभी युद्ध भी अपरिहार्य हो जाता है-
“दानवों का दमन कर राम क्या प्रसन्न थे,
विवशता थी, अन्यथा मनुष्यता मर न जाती,क
शिष्ट जीवन हेतु स्थापित हुई जो
आर्यावृत्त की संस्कृत्त की संस्कृति क्या सर उठाती।।”
युद्ध कितना भी अपरिहार्य क्यों न हो, शांति का अपना मानव समाज महत्व है। युद्ध में विजयी राम भी यही सोचते हैं-
राम परमब्रह्म परमात्मा है, जो मानव अवतार लेकर मानव समाज को दिशा दिने आए हैं। राम मर्यादा पुरुषोत्तम है। अनेक कष्ट सहने के उपरांत भी उन्होंने अपनी सर्यादा नहीं छोड़ी । वह चाहते तो वनगमन से इंकार कर सकते थे, उनके पास तर्क था-
“चाहता तो पश्चन करता पुतृ से मैं
बहुविवाह क्या न मेरे भाग्य का कारण बने,
छोड़कर तुमको न होता अन्य कोई
कौन शक्ति थी तो मेरे किरीट का वारण बने।।”
किन्तु यदि ऐसा होता तो क्या, राम सर्यादा पुरुषोत्तम कहाते, क्या वे मानव समाज का आदर्श बन पाते क्या वे देवत्व प्राप्त कर पाते। कवि का कथन है- “किन्तु यदि ऐसा होता तो क्या, राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहाते, क्या वे मानव समाज का आदर्श बन पाते क्या वे देवत्व प्राप्त कर पाते । कवि का कथन है-
पुत्र होकर में पिता से प्रश्न करता
फिर कहाँ यह पुत्रधर्म आदर्श होता
फिर कहाँ यह राम यह आलोक होता
राम क्या ? इतिहास में उत्कर्ष होता।
न लगाता चरणरज माथे यदि तो,
दशरथसुत राम मुझको कौन कहता
जन्म पाता कुछ दिवस पश्चात मृत्यु वरण करता
राम केवल राम रहता ,विश्व सारा मौन रहता।।
राम चरित्र चिर पुरातन होते हुए भी चिर नवीन है। आज तक सहस्त्रों ग्रंथ राम पर लिख गए किन्तु प्रित्येक ग्रंथ में राम एक नए रूप में प्रगट होते हैं। कवि श्री हिदायत अली ‘कमलाकर’ ने राम को एक सर्वथा नए रूप में में प्रकट किया है। चिन्तक राम लंका पर आक्रमण के पूर्व युद्ध से संबंधित समस्त धवन-धूमिका पक्ष पर गंभीरता से विचार करते हैं। इस खण्ड-काव्य में कवि ने समस्त संदर्भों को किसी कथा-खंड में नहीं बांधा है वरन् कुछ पल की घटनाओं को गंभीर चिंतन के माध्यम से प्रस्तुत किया है। कैकीय प्रसंग एवं वानर प्रसंग को एक नहीं दृष्टि भारतीय संस्कृति एवं परंपरा को अत्यंत सहज-सरल शब्दों में पुस्तुत किया है। खण्डकाव्य की मूलभावना युद्ध एवं शांति का अर्न्तद्वद्व एवं सबसे बढ़कर मानव-मानव में परस्पर प्रें की स्थापना है-
“प्रेम ही तो आत्मा है विश्वजन की,
आकृतियों से, रंग से, अन्तर न पड़ता,
वैशभूषा और भाषा भी पृथक हो,
स्वप्नचक्षु भाव मन का कब बदलता।”
हिंदी साहित्य में अनेक मुस्लिम कवि हुए हैं जिन्होंने माँ भारती के कोष में श्रीवृद्धि की । अमीर खुसरों को तो खड़ी बोली के काव्य का पुरोधा माना जाता है। रसखाननन, मलिक मुहम्मद जायसी, अब्दुल रहीम खानखाना की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए श्री हिदायत अली ‘अमलाकर’ ने अपने खण्डकाव्य ‘समर्थ राम के माध्यम से राम के एक अभिनव रूप को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। राम के चरित्र पर लिखने के पूर्व कवि को राम को अपने अर्न्तमन में धारण करना पड़ता है और जब तक राम की कौतुक कृपा न हो उन पर लिखना दुष्कर है। एक मुसलमान कवि को तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में श्री राम के संबंध में लिखने पुर्व अनेक बार सोचना पड़ता है क्योंकि निर्मम आलोचक कवि की हृदयगत भावनाओं को कम शब्दों के मायाजाल को अधिक देखने हैं, किन्तु कमलाकर ने इन सब बातों की परवाह न करते हुए विशुद्ध मन से राम के प्रति समर्पित अपनी भावनाओं को बेेवाकी के साथ शब्द दिए हैं, उन्हें संवारा है, पूजा है, काव्य की अभ्यर्थना की है।कवि चुनौती देते हुए कहता है कि राम का नाम सभी जपते हैं किन्तु राम को हमने वास्तव में कितना जाना है, कितना हमने अपने हृदय को राममय किया है । राम स्वार्थ के नहीं परमार्थ के देव हैं, राम की आस्था के विश्वास हैं । शान्ति के ध्वज वाहक हैं, मानवता की पहचान हैं। कवि का कथन है-
“राम मेरे अंतर-अनादि-अपरिमेय हैं,
विश्वास हैं अभिराम मन की आस्था के,
आर्यावृत की शांति के ध्वजवाहक राम है,
राम हैं सर्वत्र सर्वस्व मनुष्यता की कथाके
आओं हृदय पर चढ़े दूषित पटल को
खोलकर देखें, वास्तव में राम क्या हैं,
धर्म, भाषा द्वेष को हम भूलकर, जय
बोलकर देखें, वास्तव में राम क्या हैं।”
विगत चालीस वर्षों से मैं श्री हिदायत अली ‘कमलाकर’की काव्यकला का प्रसंसक रहा हूँ। वास्तव में हिंदी साहित्य के प्रति जैसी समर्पणशीलता, ललक, लगन, उत्साह और तल्लीनता श्री कमलाकर मैं है बहुत कम साहित्यप्रेमियों में पायी जाती है। मैं भली-भांति जानता हूँ कि जो स्थान, सम्मान और महत्ता श्री कमलाकर के व्यक्तित्व और कृतित्व को मिलनी चाहिए थी वह हिंदी जगत ने उन्हें नहीं दिया तथापि इस सब बातों से दूर श्री कमलाकर किसी मौन तपस्वी साधक की भांति साहित्य की सतत् सेवा कर रहे हैं । श्री कमलाकर जितने सिद्धहरूत कवि हैं, उससे बढ़कर नहीं अच्छे इंसान है। सभी धर्मों के धर्मग्रथों का आपने पूरी श्रद्धा भक्ति के अध्ययन किया है और सभी धर्मों के प्रति समभाव एवं श्रद्धा की भावना रखते हैं। यारों के यार हैं और दुश्मनी तो कभी किसी की ही नहीं। हाँ, चाटुकारिता और खुशामदखोरी से कोसों दूर है। बेवाकी और साफगोई ही आपकी पहचान है। ‘समर्थ राम’ श्री कमलाकर का नवीन खण्डकाव्य है जिसमें कमलाकर ने अपनीहृदयगत भावनाओं को अत्यंत सहजता, सरलता केसाथ प्रस्तुत किया है। खण्डकाव्य कीभावनाओं के अनुकूल भाषा का प्रवाह भीदृष्टव्य है। यथावसन अलंकारों का सुन्दर प्रयोग कवि ने किया है। कुल मिलाकर कवि हिदायत अली ‘कमलाकर’ यह कृति परनीय, संग्रहणीय एवं सराहनीय है। साहित्य जगत् में उसका यथोचित सम्मान होगा इसका मुझे विश्वास है।
दिनांक -20.04.06
डॉ. विजय कुमार सिन्हा
स्वप्न नीड
पारिजात कॉलोनी, नेहरू नगर
बिलासपुर (छ.ग.)
स्वप्न नीड
पारिजात कॉलोनी, नेहरू नगर
बिलासपुर (छ.ग.)
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